सिद्धार्थनगर: खाकी पर हमला करने वाले तीन दबंग गिरफ्तार, सिसवा पाठक कांड की यादें हुईं ताजा
Sandesh Wahak Digital Desk: सिद्धार्थनगर जनपद के मोहाना थाना क्षेत्र से एक ऐसी खबर आई जिसने इलाके के लोगों को 40 साल पुराने एक काले अध्याय की याद दिला दी। एक पुलिस आरक्षी पर हुए जानलेवा हमले के बाद गांव में तनाव का माहौल था, लेकिन पुलिस की सूझबूझ और त्वरित कार्रवाई ने स्थिति को बिगड़ने से बचा लिया।

दरअसल थाना मोहाना अंतर्गत ग्राम सिसवा पाठक में एक पुलिस आरक्षी के साथ बेरहमी से मारपीट और जानलेवा हमले का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन मुख्य अभियुक्तों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इस घटना ने इलाके में 1982 के उस बहुचर्चित ‘सिसवा पाठक कांड’ की यादें ताजा कर दीं, जिसने कभी पूरे प्रदेश को हिला कर रख दिया था।
क्या है ताजा मामला?
बता दें कि बीती 26 फरवरी की रात करीब 8 से 9 बजे के बीच, मोहाना थाने में तैनात आरक्षी रोहित यादव अपनी गश्ती ड्यूटी पूरी कर सिसवा पाठक से सिकरी बाजार की ओर लौट रहे थे। रास्ते में एक पुलिया के पास तीन युवकों ने अपनी बाइक बीच सड़क पर खड़ी कर रखी थी। आरक्षी रोहित ने जब उन्हें बाइक रास्ते से हटाने को कहा, तो तीनों युवक आगबबूला हो गए और आरक्षी पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया।
हमला इतना भीषण था कि आरक्षी का सिर फट गया और वह खून से लथपथ होकर वहीं बेहोश हो गए। सूचना मिलने पर पीआरबी 112 ने उन्हें तत्काल सीएचसी बर्डपुर में भर्ती कराया, जहां उनकी जान बच सकी।

इन अभियुक्तों को भेजा गया जेल
थानाध्यक्ष जितेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि आरक्षी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने तीनों हमलावरों को गिरफ्तार कर लिया है।
- सुनील पाठक उर्फ चिंकू 2. राजकुमार पाठक 3. वीरेंद्र गुप्ता इनमें से सुनील और राजकुमार शातिर किस्म के अपराधी हैं, जिन पर पहले से ही कई मुकदमे दर्ज हैं। पुलिस के अनुसार, इनका सुरक्षाकर्मियों के साथ मारपीट करने का पुराना इतिहास रहा है।
इतिहास के पन्नों में सिसवा पाठक: क्यों सहम गए थे ग्रामीण?
जैसे ही पुलिस पर हमले की खबर फैली, ग्रामीणों के मन में 40 साल पुराना डर बैठ गया। लोग चर्चा करने लगे कि कहीं “दूसरा सिसवा पाठक कांड” तो नहीं होने वाला?
क्या था 1982 का सिसवा पाठक कांड?
जून 1982 में तत्कालीन थाना प्रभारी वीरेंद्र राय ने ग्रामीणों के विरोध से नाराज होकर पूरे गांव पर पुलिस टीम के साथ धावा बोल दिया था। आरोप था कि पुलिस ने दिन-दहाड़े गांव को लूटा, घरों में आग लगाई और महिलाओं के साथ बदसलूकी की।
उस समय इस कांड ने इतनी तूल पकड़ी थी कि मेनका गांधी, मोहसिना किदवई और माधव प्रसाद त्रिपाठी जैसे दिग्गज नेता हाथी पर सवार होकर और पगडंडियों पर पैदल चलकर गांव का हाल जानने पहुंचे थे।
पुलिस की सूझबूझ से बची शांति
ग्रामीणों को डर था कि सिपाही पर हमले के बाद पुलिस फिर से वही पुराना रुख अपना सकती है, लेकिन वर्तमान पुलिस प्रशासन ने केवल अपराधियों पर कानूनी शिकंजा कसा और निर्दोष ग्रामीणों को कोई परेशानी नहीं होने दी। थानाध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि कानून हाथ में लेने वालों के लिए जेल ही सही जगह है।
रिपोर्ट: जाकिर खान
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