नीतीश कुमार के दिल्ली प्रस्थान के साथ बिहार में ‘जेपी युग’ का अंत, अब भाजपा के सामने बड़ी चुनौती
Sandesh Wahak Digital Desk: बिहार की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के साथ ही सूबे की सियासत से ‘जेपी आंदोलन’ की उस अंतिम छाया का भी प्रस्थान हो गया है, जिसने पिछले पांच दशकों से सत्ता की दिशा तय की थी। 1970 के दशक के छात्र आंदोलन से उपजी ‘त्रिमूर्ति’ (लालू, नीतीश और पासवान) के सक्रिय राजनीति से हटने के बाद अब बिहार एक पूरी तरह नए नेतृत्व की ओर देख रहा है।
जेपी आंदोलन की ‘त्रिमूर्ति’ और एक युग का समापन
पिछले 50 वर्षों में बिहार की राजनीति तीन धुरियों के इर्द-गिर्द घूमती रही, जो अब इतिहास का हिस्सा बनती जा रही हैं।
रामविलास पासवान: दलित राजनीति के कद्दावर नेता, जिनका निधन हो चुका है।
लालू प्रसाद यादव: अस्वस्थता के चलते सक्रिय राजनीति से दूर हैं और विरासत बेटे तेजस्वी यादव को सौंप चुके हैं।
नीतीश कुमार: पिछले 20 वर्षों से बिहार की सत्ता के केंद्र रहे नीतीश अब दिल्ली की राजनीति में नई भूमिका निभाने जा रहे हैं।
सुशील कुमार मोदी: जेपी आंदोलन के एक और प्रमुख स्तंभ और पूर्व डिप्टी सीएम, जिनका भी निधन हो चुका है।
नीतीश का ‘सोशल इंजीनियरिंग’ मॉडल: भाजपा के लिए बड़ी परीक्षा
नीतीश कुमार ने बिहार में जो ‘अति पिछड़ा’ (EBC) और ‘महादलित’ का वोट बैंक तैयार किया था, वह उनकी सबसे बड़ी ताकत रही। भाजपा के लिए उनकी जगह भरना आसान नहीं होगा क्योंकि कुर्मी और कुशवाहा समाज का लगभग 7% समर्पित वोट बैंक नीतीश के साथ रहा। ‘शराबबंदी’ और ‘जीविका दीदी’ जैसी योजनाओं के माध्यम से नीतीश ने साइलेंट वोटर (महिलाएं) के बीच अपनी गहरी पैठ बनाई थी। ‘जंगलराज’ के टैग के खिलाफ उन्होंने ‘सुशासन’ की जो छवि गढ़ी, उसे बनाए रखना नए सीएम के लिए बड़ी चुनौती होगी।
भाजपा के लिए सत्ता की राह: तीन मुख्य स्तंभ
सूत्रों और राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा बिहार में अपनी लंबी पारी खेलना चाहती है, तो उसे इन तीन मोर्चों पर खुद को साबित करना होगा।
- कानून व्यवस्था: नीतीश द्वारा स्थापित सुरक्षा के मानकों को बरकरार रखना।
- महिला सशक्तिकरण: महिलाओं के बीच जो भरोसा नीतीश ने बनाया, उसे टूटने न देना।
- जातीय समीकरण: बिना किसी बड़े चेहरे के अति पिछड़ों और सवर्णों के बीच संतुलन साधना।
नीतीश कुमार के जाने से बिहार में एक ‘राजनैतिक निर्वात’ (Political Vacuum) पैदा हुआ है। जहाँ राजद इसे भरने की कोशिश करेगी, वहीं भाजपा पहली बार अपने दम पर मुख्यमंत्री बनाकर एक नए बिहार की नींव रखने की तैयारी में है।
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