बंगाल की हार से अखिलेश यादव हुए ‘अलर्ट’, भाजपा को दी ये चुनौती

Sandesh Wahak Digital Desk: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की हार और भाजपा की प्रचंड जीत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में सरगर्मियां तेज हो गई हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा को घेरते हुए एक नई मांग रख दी है। उन्होंने केंद्र सरकार को चुनौती दी है कि यदि वे वास्तव में नारी शक्ति के हितैषी हैं, तो वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही महिला आरक्षण को लागू करने की स्पष्ट घोषणा करें।

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ (X) पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जो महिला आरक्षण विपक्ष ने मिलकर संसद में पास कराया था, उसे 2027 के यूपी चुनाव में ही लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “भाजपा तत्काल इसकी घोषणा करे, या फिर यह स्वीकार करे कि पुरुषवादी भाजपाई और उनके सामंती संगी-साथी महिलाओं को आरक्षण देने के खिलाफ हैं। जब तक यह घोषणा नहीं होती, तब तक हम यह बात हर हफ्ते जगह-जगह उठाते रहेंगे।”

पीडीए (PDA) बनाम नारी शक्ति वंदन

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अखिलेश की यह मांग उनकी व्यापक ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) रणनीति का हिस्सा है। यूपी में महिला वोट प्रतिशत निर्णायक होता है, जिसे साधने के लिए अखिलेश अब फ्रंट फुट पर खेल रहे हैं। वहीं, भाजपा लगातार यह आरोप लगा रही है कि विपक्षी दलों के कारण ही पिछली 17 अप्रैल को संसद में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित नहीं हो सका था।

अखिलेश यादव ने बंगाल की जीत पर कटाक्ष करते हुए मुख्यमंत्री पद के लिए अभिनेत्री और भाजपा नेता रूपा गांगुली का नाम उछाला। उन्होंने महाभारत की ‘द्रौपदी’ की भूमिका का संदर्भ देते हुए लिखा कि बंगाल का परिणाम ‘मनमर्जी’ से निकला है, तो मुख्यमंत्री भी ‘मनमर्जी’ से बनेगा। उन्होंने तंज कसा कि इस बार ‘पर्ची’ उनके नाम की निकलनी चाहिए जो नारी के शोषण के खिलाफ संघर्ष की प्रतीक रही हैं। इसे भाजपा की ‘पर्ची संस्कृति’ (मंत्रियों/मुख्यमंत्रियों के चयन) पर सीधे प्रहार के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है महिला आरक्षण की स्थिति?

नियमतः महिला आरक्षण कानून को 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू होना था। इसके लिए सीटों की संख्या भी बढ़ाई जानी है। हालांकि, अखिलेश यादव की मांग ने इस प्रक्रिया को समय से पहले यूपी चुनाव में लागू करने का दबाव बढ़ा दिया है, जिससे 2027 के चुनाव में यह एक बड़ा चुनावी एजेंडा बनने जा रहा है।

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