Wheat Price: गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन ने बढ़ाई किसानों की मुसीबत, जानें क्यों घट रही कमाई?
Wheat Price in India: देश में इस साल गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन और उम्मीद से अधिक सरकारी खरीद ने मंडियों का समीकरण पूरी तरह बदल दिया है। केंद्रीय पूल में गेहूं की खरीद बढ़कर साढ़े तीन करोड़ टन से अधिक हो गई है। यह पिछले साल के तीन करोड़ टन से काफी अधिक है।
एक तरफ सरकारी गोदाम गेहूं से पट रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मंडियों में बंपर आवक के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है। किसानों को उम्मीद थी कि निजी व्यापारी MSP से ऊपर दाम देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। इससे पहले से सुस्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर और दबाव बढ़ गया है।
मंडियों में गेहूं के ताजा भाव (जून 2026)
प्रमुख मंडियों में गेहूं के दाम इस प्रकार हैं:
- दिल्ली (नरेला मंडी) – 2,650 रुपये प्रति क्विंटल
- इंदौर (मध्य प्रदेश) – 3,080 रुपये प्रति क्विंटल
- कानपुर (उत्तर प्रदेश) – 2,950 रुपये प्रति क्विंटल
- राजकोट (गुजरात) – 3,025 रुपये प्रति क्विंटल
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस साल गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। अधिकांश मंडियों में भाव एमएसपी से ऊपर चल रहे हैं, लेकिन पिछले साल के मुकाबले बढ़ोतरी बहुत कम है। राजस्थान की बिलाड़ा मंडी में गुणवत्ता वाले गेहूं के 3,500 रुपये प्रति क्विंटल तक दाम मिले हैं, लेकिन यह अपवाद है।
राज्यवार सरकारी खरीदारी के आंकड़े
इस बार सरकारी एजेंसियों ने रिकॉर्ड गेहूं खरीदा है। राज्यवार स्थिति कुछ इस प्रकार रही :
- पंजाब – 121 लाख टन (पिछले साल 119 लाख टन)
- मध्य प्रदेश – 104 लाख टन (पिछले साल 78 लाख टन)
- हरियाणा – 81 लाख टन (पिछले साल 70 लाख टन)
- राजस्थान – 24 लाख टन (पिछले साल 19 लाख टन)
- उत्तर प्रदेश – 17 लाख टन (पिछले साल 10 लाख टन)
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सबसे तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। उत्तर प्रदेश में तो खरीदारी पिछले साल से करीब सत्तर फीसदी बढ़ गई है।
किसानों पर क्या असर पड़ेगा?

कटाई के समय आई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से गेहूं की गुणवत्ता पर असर पड़ा था। इसलिए निजी मिलर्स और व्यापारी ऊंचे दाम देने को तैयार नहीं थे। किसानों को सरकारी एजेंसियों पर ही निर्भर रहना पड़ा।
एग्रोकॉर्प इंटरनेशनल के रिसर्च हेड का कहना है कि आने वाले दिनों में गेहूं के भाव में बड़ी तेजी की उम्मीद नहीं है। निर्यात ही एकमात्र विकल्प है, लेकिन रूस और यूक्रेन के मुकाबले भारतीय गेहूं महंगा होने के कारण बड़े निर्यात की संभावना कम है।
कम दाम मिलने का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। किसानों की जेब में कम पैसा पहुंचेगा, जिससे ट्रैक्टर, टू-व्हीलर और अन्य कृषि उपकरणों की मांग घट सकती है। ग्रामीण बाजारों में पहले से चल रही सुस्ती और गहराने की आशंका है।

