ईरान ने अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पीएम मोदी को भेजा न्योता
Sandesh Wahak Digital Desk: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण दिया है। अयातुल्ला खामेनेई की 28 फरवरी को इजरायली-अमेरिकी हमले में मौत हो गई थी।
क्षेत्रीय संघर्ष और सुरक्षा चिंताओं के कारण अंतिम संस्कार कार्यक्रम को कई महीनों तक टालना पड़ा। अब यह ऐतिहासिक आयोजन 4 जुलाई से 9 जुलाई तक चलेगा। कार्यक्रम की शुरुआत तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर में खामेनेई के पार्थिव शरीर को आम लोगों और विदेशी प्रतिनिधियों के अंतिम दर्शन के लिए रखने के साथ होगी।
इसके बाद तेहरान और पवित्र शहर कौम में बड़े सार्वजनिक जुलूस निकाले जाएंगे। पार्थिव शरीर को इराक के धार्मिक शहरों नजफ और कर्बला भी ले जाया जाएगा, जहां विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित होंगी। अंतिम संस्कार 9 जुलाई को खामेनेई के गृह नगर मशहद में स्थित इमाम रजा दरगाह में किया जाएगा।
भारत किसे भेजेगा, अभी तक कोई फैसला नहीं
भारत सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस समारोह में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कौन करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद जाएंगे या किसी वरिष्ठ मंत्री अथवा विशेष दूत को भेजा जाएगा, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है। विदेश मंत्रालय जल्द ही इस पर आधिकारिक घोषणा कर सकता है।
भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। अयातुल्ला खामेनेई के निधन पर भारत ने तुरंत संवेदना व्यक्त की थी। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए थे।
मई 2024 में जब ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हुई थी, तब भारत ने एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया था और तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया था। रईसी के बाद राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के शपथ ग्रहण समारोह में केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ईरान गए थे।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल और भारत की कूटनीतिक चुनौती
ईरानी मीडिया के अनुसार, इस अंतिम संस्कार समारोह में इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, लेबनान, रूस, चीन और कई मध्य एशियाई देशों के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल शामिल होंगे। भारत के लिए यह फैसला बेहद संवेदनशील है क्योंकि उसे ईरान, खाड़ी देशों और इजरायल के साथ अपने रिश्तों में संतुलन बनाए रखना है। चाबहार बंदरगाह, ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया में रणनीतिक हितों को देखते हुए नई दिल्ली का फैसला क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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