बसपा में सिर्फ ‘माया ही माया’, बाकी सब छलावा? नेतृत्व से संगठन तक मायावती का दबदबा
2027 में किसके दम पर फिर खड़ी होगी बसपा?
लखनऊ। राजनीति में “मोह-माया” शब्द के कई मायने होते हैं। बसपा में इस समय कुछ ऐसा ही चल रहा है। हालांकि बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनों का मोह तो त्यागा है, लेकिन पार्टी “माया” से कब तक दूर रह पाती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। क्योंकि जमीनी स्तर पर काम करने वालों को अगर चुनावी मैदान में उतारा जाएगा और उनके साथ मेहनत की जाएगी तो निश्चित तौर पर नतीजे पहले से बेहतर होंगे।
बहुजन समाज पार्टी कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता का सबसे बड़ा दलित राजनीतिक केंद्र हुआ करती थी। कांशीराम ने जिस आंदोलन की नींव रखी, मायावती ने उसे सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। लेकिन आज वही बसपा ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सबसे बड़ा सवाल चुनाव जीतने से पहले संगठन और नेतृत्व के भविष्य का है। पार्टी में फैसलों की अंतिम मुहर मायावती की रही है और उनके आसपास दूसरी मजबूत कतार लगातार कमजोर होती गई। नतीजा यह कि कभी 206 विधायक देने वाली बसपा आज विधानसभा में अपना एक भी विधायक नहीं रखती।
2007 में बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर 30.43 प्रतिशत वोट के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। यही वह दौर था, जब दलित आधार के साथ ब्राह्मण और दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़कर मायावती ने ‘सर्वजन’ का सफल समीकरण खड़ा किया। इसके बाद गिरावट शुरू हुई। 2012 में 80 सीट और 25.91 प्रतिशत वोट, 2017 में 19 सीट और 22.23 प्रतिशत वोट तथा 2022 में महज एक सीट और 12.88 प्रतिशत वोट रह गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा का खाता तक नहीं खुला और उसका वोट प्रतिशत घटकर करीब 9.39 प्रतिशत रह गया, जबकि 2019 में उसे 19.42 प्रतिशत वोट मिले थे।
यह गिरावट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति आबादी करीब 21.1 प्रतिशत है। यानी बसपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि दलित आबादी कितनी है, बल्कि यह है कि उस आबादी का कितना हिस्सा अब उसके साथ राजनीतिक रूप से खड़ा है। गैर-जाटव दलितों का एक हिस्सा भाजपा की ओर गया है, कुछ दलित मतदाता सपा के सामाजिक समीकरण से जुड़े हैं और युवाओं के बीच चंद्रशेखर आजाद भी नई राजनीतिक संभावना बनकर उभरे हैं। ऐसे में बसपा का पारंपरिक दलित आधार अब पहले जैसा एकजुट नहीं दिखाई देता।
बसपा में दूसरी कतार क्यों नहीं टिक सकी?
बसपा की सबसे बड़ी ताकत कभी उसका मजबूत संगठन और अनुशासित कैडर था। लेकिन समय के साथ एक-एक कर कई पुराने चेहरे पार्टी से बाहर होते गए। स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, लालजी वर्मा, रामअचल राजभर, ओमप्रकाश राजभर, बृजेश पाठक और रामवीर उपाध्याय जैसे नेता अलग-अलग समय में बसपा से बाहर होकर दूसरे राजनीतिक ठिकानों पर पहुंचे। किसी को निष्कासित किया गया तो किसी ने खुद रास्ता बदला, लेकिन संदेश एक ही गया कि पार्टी में मायावती के बाद प्रभावशाली दूसरी कतार टिक नहीं सकी।
यहीं से ‘बसपा में सिर्फ माया ही माया’ वाली राजनीतिक चर्चा जन्म लेती है। ‘माया’ यहां मायावती के साथ उस राजनीतिक धारणा की ओर भी इशारा करती है, जिसमें पार्टी के टिकटों में आर्थिक ताकत को महत्व देने और पैसे के प्रभाव के आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों को हर मामले में प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन यह धारणा पार्टी की राजनीतिक छवि का हिस्सा जरूर बनी है। सवाल यह है कि जिस पार्टी ने कभी सामाजिक परिवर्तन की राजनीति को अपनी पहचान बनाया था, क्या वह फिर उसी वैचारिक ऊर्जा के साथ जनता के बीच लौट पाएगी!
आकाश आनंद से लेकर उत्तराधिकारी तक सवाल
सबसे ताजा संकट उत्तराधिकार का है। आकाश आनंद को पहले उत्तराधिकारी बनाया गया, फिर हटाया गया, वापस लाया गया और दोबारा जिम्मेदारी से दूर किया गया। सितंबर 2026 में अशोक सिद्धार्थ की भूमिका को लेकर भी घटनाक्रम तेजी से बदला। मायावती ने आकाश के राजनीतिक भविष्य के लिए उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के पूरी तरह राजनीति से हटने की शर्त रखी। अशोक ने राजनीतिक और सामाजिक संन्यास की घोषणा की, लेकिन इसके बाद भी मायावती ने आकाश को बसपा से पूरी तरह अलग कर दिया। इसके बाद आकाश के छोटे भाई इशान आनंद को लेकर भी जो संभावनाएं बन रही थीं, मायावती ने साफ कर दिया कि न आकाश और न इशान आगे पार्टी में राजनीतिक पद संभालेंगे।
तो फिर सवाल यही है, मायावती चाहती क्या हैं? क्या वह परिवारवाद से बसपा को बचाना चाहती हैं, क्या उन्हें डर है कि मजबूत दूसरी कतार भविष्य में पार्टी को गुटों में बांट सकती है या फिर वह ऐसा उत्तराधिकारी तलाश रही हैं, जो परिवार से बाहर का हो लेकिन पूरी तरह मिशन के प्रति समर्पित और उनके भरोसे का हो। इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी मायावती ने नहीं दिया है। उन्होंने जरूर संकेत दिया है कि उनकी भतीजी दीपिका आनंद योग्य, ईमानदार और मिशन के प्रति निष्ठावान हुईं तो उन्हें जिम्मेदारी मिल सकती है, अन्यथा किसी सर्वमान्य मिशनरी दलित कार्यकर्ता को आगे किया जा सकता है।
2027 में बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती
2027 की लड़ाई में मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने का रास्ता चुना है। चुनौती साफ है कि पहले अपना खोया दलित आधार वापस हासिल करना, फिर सर्वसमाज का पुराना समीकरण खड़ा करना और बूथ स्तर तक संगठन को दोबारा सक्रिय करना।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल संगठन का है। एक मजबूत नेता पार्टी को सत्ता तक पहुंचा सकता है, मगर किसी राष्ट्रीय पार्टी का भविष्य केवल एक चेहरे के भरोसे नहीं चल सकता। 2027 बसपा के लिए सिर्फ सीटों का चुनाव नहीं, बल्कि यह तय करने का चुनाव होगा कि कांशीराम और मायावती की बनाई राजनीतिक विरासत आगे किसके हाथ में जाएगी और क्या बसपा फिर एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनेगी या इतिहास के अपने ही सुनहरे दौर को याद करती रह जाएगी!
रिपोर्ट: चेतन गुप्ता
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