RBI ने बढ़ाया इंफ्लेशन का अनुमान, इस साल जेब पर भारी पड़ेंगे तेल, गैस और राशन

Sandesh Wahak Digital Desk: देश में आने वाले दिनों में आम जनता को एक बार फिर महंगाई की तपिश झेलनी पड़ सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी ताजा मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में मौजूदा वित्त वर्ष (FY 2027) के लिए खुदरा महंगाई दर के अनुमान को 50 बेसिस प्वाइंट (0.50%) तक बढ़ा दिया है। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति का एलान करते हुए बताया कि वित्त वर्ष 2027 में महंगाई दर 5.1% के स्तर पर पहुंच सकती है, जिसके पहले 4.6% रहने की उम्मीद जताई गई थी। यह नया अनुमान केंद्रीय बैंक के तय सुरक्षित लक्ष्य (2-4%) की ऊपरी सीमा से कहीं ज्यादा है। गवर्नर ने इसके पीछे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक तनाव (युद्ध) और ‘अल-नीनो’ के संभावित खतरों को मुख्य वजह बताया है।

गवर्नर के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम उथल-पुथल के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अब तक महंगाई को 4% के दायरे से नीचे रखने में सफल रही थी। आंकड़ों पर नजर डालें तो फरवरी 2026 में महंगाई दर 3.2%, मार्च में 3.4% और अप्रैल में 3.5% दर्ज की गई थी, जो नियंत्रण में थीं। हालांकि, अब ग्लोबल सप्लाई चैन बाधित होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले दो महीनों में भारतीय बास्केट के लिए क्रूड ऑयल औसतन 110 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहा है, जिसका सीधा असर मई महीने से ही घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों पर दिखना शुरू हो चुका है।

तिमाही आधार पर महंगाई का नया अनुमान

केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष की चारों तिमाहियों के लिए जो अनुमान जारी किया है, वह इस प्रकार है।

तिमाही (Quarter) अनुमानित महंगाई दर
जून 2026 तिमाही 4.2%
सितंबर 2026 तिमाही 5.1%
दिसंबर 2026 तिमाही 5.9% (सबसे ज्यादा दबाव)
मार्च 2027 तिमाही 5.4%

खेती-किसानी और ग्रामीण मांग पर अल-नीनो का साया

भारतीय मौसम विभाग की चेतावनी का हवाला देते हुए आरबीआई ने चिंता जताई है कि इस साल के अंत में पिछले तीन दशकों का सबसे गंभीर ‘अल नीनो’ पैटर्न सक्रिय हो सकता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान औसत से कम बारिश होने की आशंका है, जिससे कृषि पैदावार में गिरावट आ सकती है। इसका सीधा असर ग्रामीण भारत में वस्तुओं की मांग और खाद्य उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा। गवर्नर ने सचेत किया कि कमजोर होती वैश्विक अर्थव्यवस्था, सप्लाई चेन की रुकावटें और महंगी ऊर्जा दरें देश की विकास दर और वित्तीय स्थिरता दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

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