सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को मानवीय आधार पर कैदियों की रिहाई के लिए नीति बनाने का दिया आदेश
Sandesh Wahak Digital Desk: देश की जेलों में बंद बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद मानवीय और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सख्त आदेश दिया है कि वे 70 साल से अधिक उम्र के, असाध्य रोगों से पीड़ित और शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों की समय से पहले रिहाई के लिए तीन महीने के भीतर एक पारदर्शी और स्पष्ट नीति तैयार करें।
मानवाधिकारों और स्वतंत्रता का हवाला
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्देश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में दलील दी गई थी कि जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के बीच ऐसे लाचार कैदियों को बंद रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीने के अधिकार) का खुला उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि नई नीति में लाइलाज बीमारी की सटीक परिभाषा तय होनी चाहिए और मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच की निष्पक्ष व्यवस्था होनी चाहिए।
ई-प्रिजन्स पोर्टल से होगी पूरी निगरानी
न्यायालय ने प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और तेज बनाने के लिए इसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने का निर्देश दिया है। अब रिहाई से जुड़े सभी आवेदनों की प्रोसेसिंग ई-प्रिजन्स पोर्टल के माध्यम से की जाएगी। इस पोर्टल पर आवेदन करने से लेकर, मेडिकल बोर्ड की जांच, जेल प्रशासन की रिपोर्ट और सक्षम प्राधिकारी के अंतिम फैसले तक की पूरी जानकारी ऑनलाइन दर्ज होगी। समय-सीमा का कड़ाई से पालन हो, इसके लिए पोर्टल में अलर्ट सिस्टम और डेडलाइन मॉनिटरिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी जाएंगी।
मंत्रालयों को तकनीकी मदद और हलफनामे का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस डिजिटल व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को निर्देश दिया है कि वे राज्यों को जरूरी सॉफ्टवेयर, ट्रेनिंग और तकनीकी ढांचा उपलब्ध कराएं। इसके साथ ही, केंद्र और सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया गया है कि वे अगले छह महीनों के भीतर अदालत में अनुपालन हलफनामा दाखिल कर यह बताएं कि इस नीति के तहत कितने कैदियों को चिह्नित किया गया और कितनों को रिहा किया गया है।
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