CJI सूर्यकांत को 23 बड़े नेताओं ने लिखा संयुक्त पत्र, वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटाने का आरोप
Sandesh Wahak Digital Desk: देश की चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता को लेकर विपक्षी खेमे ने एक बहुत बड़ा और असाधारण कदम उठाया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत देश के 23 प्रमुख विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत और सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों को एक साझा पत्र लिखा है। इस पत्र में विपक्ष ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर दबाव होने की बात कहते हुए चुनाव प्रक्रिया में कथित हेरफेर पर गहरी चिंता जताई है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि वे यह कदम उठाने पर इसलिए मजबूर हुए हैं क्योंकि वर्तमान में गणतंत्र के मूल स्तंभ खतरे में हैं और हालिया चुनाव परिणाम जनता की वास्तविक इच्छा को नहीं दर्शाते।
विपक्ष ने अपनी मुख्य आपत्ति चुनाव आयोग (ECI) की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर उठाई है। नेताओं ने इसे पूरी तरह राजनीतिक रूप से प्रेरित और समाज के कमजोर वर्गों को बाहर करने वाली कवायद करार दिया है। आरोप है कि इस प्रक्रिया के चलते देश के लाखों गरीब, अशिक्षित, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक मतदाता बिना जरूरी दस्तावेजों के अभाव में अपने वोटिंग अधिकार से महरूम हो गए हैं। पत्र में पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए दावा किया गया कि वहां लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर करीब 27 लाख वोटर्स के नाम सूची से हटा दिए गए। इसके समर्थन में उन्होंने जस्टिस टीएस शिवगणनम की अध्यक्षता वाले न्यायिक ट्रिब्यूनल के उस आंकड़े का भी हवाला दिया, जिसमें जांच की गई 96% अपीलों में वोटर्स के नाम गलत तरीके से हटाए जाने की पुष्टि हुई थी।
28 जून को भेजे गए इस पत्र पर ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला, सुप्रिया सुले और संजय सिंह समेत विपक्ष के तमाम दिग्गज नेताओं के हस्ताक्षर हैं। पत्र में न सिर्फ वोटर लिस्ट में हेरफेर बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर भी जनता के अविश्वास का मुद्दा उठाया गया है, और मांग की गई है कि चुनावी पारदर्शिता के लिए बैलेट पेपर प्रणाली पर दोबारा देशव्यापी चर्चा शुरू की जाए। इसके अलावा, पत्र में सीबीआई, ईडी और एनआईए जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिए विपक्षी नेताओं को जानबूझकर निशाना बनाने का गंभीर आरोप भी लगाया गया है। अंत में, विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम रक्षक बताते हुए गुहार लगाई है कि जब लोकतांत्रिक संस्थाएं ही दमन का जरिया बन जाएं, तब न्यायपालिका को आगे आकर लोकतंत्र के भविष्य को बचाना होगा।
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