सुप्रीम कोर्ट से UP सरकार को बड़ा झटका, 25 हजार अनुदेशकों को देना होगा 2017 से बढ़ा मानदेय

Supreme Court Verdict: उत्तर प्रदेश के करीब 25 हजार अनुदेशकों (इंस्ट्रक्टर्स) को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने यूपी सरकार की पुनर्विचार (रिव्यू) याचिका खारिज करते हुए अपने पुराने फैसले को बरकरार रखा है। इसका मतलब है कि अब राज्य सरकार को इन अनुदेशकों को वर्ष 2017-18 से बढ़ा हुआ मानदेय (Honorarium) देना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि एक दशक से अधिक समय तक सिर्फ 7,000 रुपये मासिक पर काम कराना उचित नहीं है। अदालत ने पहले दिए गए अपने फैसले में कहा था कि इतने लंबे समय तक कम मानदेय पर काम लेना संविधान की भावना के खिलाफ है।

 

क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत साल 2013 में जूनियर हाई स्कूलों (कक्षा 6 से 8) के लिए पार्ट-टाइम अनुदेशकों की भर्ती की थी। इन्हें 11 महीने के अनुबंध पर हर महीने 7,000 रुपये मानदेय दिया जाता था।

हालांकि, अनुबंध खत्म होने के बाद भी इनका कार्यकाल लगातार बढ़ता रहा, लेकिन वेतन नहीं बढ़ाया गया। इसके खिलाफ अनुदेशकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

सबसे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2017 से 17,000 रुपये मासिक मानदेय देने का आदेश दिया था। इस फैसले को यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 4 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। अब सरकार की पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और पी.बी. वराले की पीठ ने कहा कि:

  • 10 साल से अधिक समय तक केवल 7,000 रुपये पर काम कराना उचित नहीं है।
  • यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद-23 की भावना के विपरीत है।
  • लगातार लंबे समय तक सेवा देने वाले अनुदेशकों को केवल अस्थायी कर्मचारी मानकर नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार इन अनुदेशकों को 1 अप्रैल 2026 से 17,000 रुपये प्रति माह का मानदेय देना शुरू करे और छह महीने के भीतर 2017-18 से मिलने वाली बकाया राशि (एरियर) का भुगतान करे।

सरकार की दलील क्यों नहीं मानी गई?

यूपी सरकार ने अदालत में कहा था कि यह योजना केंद्र सरकार की है और पर्याप्त फंड नहीं मिलने के कारण अधिक भुगतान संभव नहीं है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि कर्मचारियों को भुगतान करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। यदि केंद्र का हिस्सा मिलना है, तो राज्य बाद में केंद्र से राशि वसूल सकता है।

हर तीन साल में बढ़ेगा मानदेय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अनुदेशकों का मानदेय वर्षों तक एक जैसा नहीं रह सकता। इसे कम से कम हर तीन साल में संशोधित (रिवाइज) किया जाना चाहिए, ताकि महंगाई और समय के अनुसार उन्हें उचित भुगतान मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुदेशक बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य को आकार देने में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि देश का भविष्य मजबूत बनाना है, तो ऐसे शिक्षकों को सम्मान, उचित वेतन और बेहतर कार्य परिस्थितियां मिलनी चाहिए।

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