UP में डिजिटल अरेस्ट के मामले में पहली सजा, महिला डॉक्टर से 85 लाख ठगने वाले को 7 साल की कैद
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े एक बड़े साइबर ठगी मामले में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आरोपी को 7 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।
यह प्रदेश में ऐसा पहला मामला है जिसमें डिजिटल अरेस्ट के तहत की गई ठगी पर अदालत ने कठोर सजा दी है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कोर्ट, लखनऊ ने शुक्रवार को आरोपी देवाशीष राय को दोषी करार देते हुए फैसला सुनाया। देवाशीष ने खुद को नकली कस्टम और सीबीआई अधिकारी बताकर महिला डॉक्टर को मानसिक दबाव में रखकर 85 लाख रुपये की साइबर ठगी को अंजाम दिया था।
यह मामला 1 मई 2024 को सामने आया था। 5 मई 2024 को आरोपी को गिरफ्तार किया गया और 2 अगस्त 2024 को पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल की गई।
इसके बाद 348 दिनों तक चली सुनवाई के बाद, कुल 438 दिनों में यह मामला निपटाया गया। अदालत ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए कठोर सजा सुनाई।

कैसे हुआ डिजिटल अरेस्ट और ठगी
पीड़िता, लखनऊ की डॉ. सौम्या गुप्ता, को ड्यूटी के दौरान एक फोन कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को कस्टम अधिकारी बताया और कहा कि उनके नाम से भेजे गए पार्सल में जाली पासपोर्ट, एटीएम कार्ड और प्रतिबंधित नशीला पदार्थ (MDMA) मिला है।
इसके बाद कॉल को एक फर्जी सीबीआई अधिकारी से जोड़ दिया गया, जिसने डॉक्टर को डराने-धमकाने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का सिलसिला शुरू किया।
पीड़िता को लगातार संपर्क में रखते हुए आरोपी ने उसे 10 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा और इसी दौरान मानसिक दबाव बना कर 85 लाख रुपये विभिन्न खातों में ट्रांसफर करवा लिए।
फर्जी दस्तावेज और तकनीकी जाल
जांच में सामने आया कि आरोपी देवाशीष राय, आजमगढ़ निवासी है और लखनऊ के गोमतीनगर स्थित सुलभ आवास में रह रहा था। उसने ठगी के लिए फर्जी आधार कार्ड, सिम कार्ड, और बैंक खातों का इस्तेमाल किया।
पूरा अपराध तकनीकी साधनों के जरिए किया गया, जिससे यह एक सॉफिस्टिकेटेड डिजिटल क्राइम बन गया।
अदालत ने कहा— “ऐसे अपराधों के लिए सख्त सजा जरूरी”
अदालत ने सजा सुनाते हुए कहा कि अभियुक्त ने एक आम नागरिक को भयभीत कर, एजेंसियों की छवि का दुरुपयोग कर विशाल आर्थिक नुकसान पहुंचाया।
कोर्ट ने कहा, “ऐसे डिजिटल अपराध समाज में नकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं और इनमें शामिल व्यक्तियों को कड़ी सजा देना ज़रूरी है, ताकि दूसरों को भी चेतावनी मिल सके।”
क्या है डिजिटल अरेस्ट?
डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का एक उभरता हुआ रूप है, जिसमें ठग किसी व्यक्ति को कॉल, वीडियो चैट या तकनीकी माध्यम से लगातार निगरानी में रखते हैं और मानसिक रूप से डरा कर उससे धन ऐंठते हैं।
इसमें पीड़ित को भ्रमित कर यह एहसास दिलाया जाता है कि वह किसी जांच एजेंसी की निगरानी में है।
न्यायिक और साइबर विशेषज्ञों ने की तारीफ
इस ऐतिहासिक फैसले को साइबर कानून विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार समूहों ने सराहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सजा साइबर अपराधियों के लिए एक कड़ा संदेश है और इससे डिजिटल सुरक्षा की दिशा में नया मील का पत्थर स्थापित हुआ है।
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