ICICI बैंक की पूर्व CEO चंदा कोचर पर रिश्वत के आरोप साबित, 64 करोड़ की घूस मामले में दोषी करार
Sandesh Wahak Digital Desk: आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व सीईओ चंदा कोचर अब कानूनी शिकंजे में आ चुकी हैं। वीडियोकॉन ग्रुप को दिए गए 300 करोड़ रुपये के लोन मामले में एक अपीलेट ट्रिब्यूनल ने उन्हें दोषी ठहराया है। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, चंदा कोचर ने बैंक की आंतरिक नीतियों की अनदेखी करते हुए यह लोन पास किया और इस प्रक्रिया में उनके पति दीपक कोचर के जरिए 64 करोड़ रुपये की रिश्वत ली गई।
रिश्तों का फायदा और नियमों की अनदेखी
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में पहले ही गंभीर आरोप लगाए थे कि चंदा कोचर ने अपनी पोजिशन का गलत इस्तेमाल करते हुए वीडियोकॉन ग्रुप को फेवर दिया। ट्रिब्यूनल ने 3 जुलाई 2025 को दिए गए अपने आदेश में इस बात की पुष्टि कर दी कि यह मामला ‘quid pro quo’ यानी ‘कुछ के बदले कुछ’ का क्लासिक उदाहरण है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, जैसे ही ICICI बैंक ने वीडियोकॉन को 300 करोड़ का लोन पास किया, ठीक अगले दिन वीडियोकॉन की सहयोगी कंपनी SEPL ने 64 करोड़ रुपये की रकम NRPL नाम की कंपनी में ट्रांसफर की। दिखाने के लिए NRPL के कागजों में मालिकाना हक वीडियोकॉन ग्रुप के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत के नाम पर दर्ज था, लेकिन असल नियंत्रण दीपक कोचर के पास था, जो इस कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर भी थे।
बैंक के नियमों का खुला उल्लंघन
ED ने जो सबसे बड़ा आरोप लगाया, वह था चंदा कोचर द्वारा अपने पति की वीडियोकॉन ग्रुप से कारोबारी नजदीकियों को छुपाना। यह सीधे तौर पर ICICI बैंक की ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ नीति का उल्लंघन था। ट्रिब्यूनल ने माना कि चंदा कोचर ने जानबूझकर अपनी पोजिशन का फायदा उठाया और बैंक की आंतरिक जांच से भी बचने की कोशिश की।
पहले मिली राहत, अब पलटा फैसला
इससे पहले 2020 में एक प्राधिकरण ने चंदा कोचर और उनके सहयोगियों की करीब 78 करोड़ रुपये की संपत्ति को रिलीज करने का आदेश दिया था। लेकिन अब ट्रिब्यूनल ने उस फैसले को गलत करार दिया है। ट्रिब्यूनल का कहना है कि उस समय जरूरी सबूतों को अनदेखा कर दिया गया था जबकि ED ने अपने पक्ष में मजबूत साक्ष्य और एक स्पष्ट टाइमलाइन पेश की थी।
इस मामले ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या ऊंचे पदों पर बैठकर निजी फायदे के लिए नियमों को ताक पर रखना अब भी आम बात है? ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में साफ लिखा कि इस पूरे मामले में चंदा कोचर ने न केवल अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया बल्कि नैतिक मर्यादाओं को भी तोड़ा।
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