इसलिए जिंदा हूं कि बोल रहा हूं, दुनिया किसी गूंगे की कहानी नहीं सुनती

मैंने जब एक आदमी को छेनी हथौड़ी से पहाड़ तोड़ते देखा तो पूछा कि यह कैसे कर पाओगे? उसने कहा करते-करते। असंभव को संभव कर दिखाने का जज्बा ही अभिव्यक्ति का जुनून है। यह प्रवृत्ति केवल इंसान में है। जानवरों में नहीं। उचित-अनुचित का फर्क कर पाने की नैसर्गिक प्रतिक्रिया उसे प्रकृति से मिली होती है। परंतु हठ और अज्ञान में लोग इसे भूल जाते हैं। उम्मीद करने लगते हैं कि सब कुछ उन्हीं के अनुरूप हो। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि ‘तदर्थ’ के पिछले एपिसोड में लिखने के लिए जो विषय मैंने चुना था। कतिपय लोगों को लगा कि यह उनके अनुकूल क्यों नहीं है। किसी विषय पर अपने वाजिब विचार रखने के लिए हम और आप स्वतंत्र हैं। लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है कि वह असहमति को भी स्थान दें।
मैं कुछ दिनों बाद जब उस पहाड़ की ओर से पुन: गुजरा तो देखा कि वह आदमी काफी दूर तक पहाड़ काटकर सीढ़ियां बना चुका था। उसने मुस्कुरा कर मुझे दिखाया। यह किसी समस्या पर विजय प्राप्त कर लेने की उसकी अपनी अभिव्यक्ति थी। मुझे बड़ा अच्छा लगा। मैं बैठकर के उसके साथ गुड़ खाया। पानी पिया। आप जो सोच रहे हैं कि यह किसी दशरथ मांझी की कहानी है। तो आप गलत हैं। यह सोनभद्र के एक सुदूरवर्ती इलाके की घटना है।

बिहार में SIR पर मैं या आप कुछ लिखें जो तथ्यपरक तो हो लेकिन हर आदमी को अच्छा लगे यह आवश्यक नहीं। सच तो यह है कि SIR के जरिए चुनाव आयोग बिहार में जिन तकरीबन 70 लाख लोगों को मतदाता सूची से हटाने वाला है। उसे लोकतंत्र की कमर तोडऩे वाला कहा जाएगा। वर्ष 2003 में पुनरीक्षण के दौरान ऐसे लोगों को मतदाता सूची में जगह दी गई थी। अगर आपके हाथ में कलम साथ में बुद्धि और विवेक भी है। तो सरकार के साथ आप भी ऐसे लोगों के प्रति जवाबदेह हो जाते हैं जिनकी छंटनी होने वाली है। मामला सर्वोच्च न्यायालय में है। हमें इसमें उसके आदेश की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

किसी मुद्दे पर लिखने और न लिखने का आपका फैसला यह समझ लेने के लिए काफी है कि आपके मुंह में लगाम है अथवा आपकी पीठ पर किसी का ठप्पा लगा है। मुंशी प्रेमचंद का पात्र सूरदास रंगभूमि नामक चर्चित उपन्यास में कहता है कि उचित-अनुचित का विचार और उसके अनुसार आचरण करने से हमें कोई रोक नहीं सकता है। प्रेमचंद गांधीवादी विचारधारा पर कलम चलाने वाले पहले उपन्यासकार थे। गांधी अनुचित के खिलाफ हर कीमत पर बोलते थे। उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति को कभी भी रोका नहीं, विराम नहीं दिया। इसलिए वे अभी तक जिंदा हैं। आप भी तभी तक जिंदा माने जाएंगे जब तक आपके भीतर तर्क की शक्ति है। और अंत में आपको फिर एक शेर के साथ छोड़ रहा हूं….
इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूं
मेरा उसूल है पहले सलाम करता हूं।
मुखालिफत से मेरी शख्सियत संवरती है।
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

