सिद्धार्थनगर की नई पहचान: ‘रामसर साइट’ बनेगा मझौली सागर, डीएम ने किया निरीक्षण

Sandesh Wahak Digital Desk: सिद्धार्थनगर से प्रकृति और पर्यटन प्रेमियों के लिए एक शानदार खबर सामने आई है। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित ‘मझौली सागर’ की किस्मत अब बदलने वाली है, जिससे न केवल पर्यावरण संवरेगा बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

जनपद की प्राकृतिक सुंदरता को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए जिला प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठाया है। जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जी एन ने सिद्धार्थ विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो० कविता शाह के सुझाव पर ‘मझौली सागर’ को अंतरराष्ट्रीय महत्व की ‘रामसर साइट’ (Ramsar Site) के रूप में विकसित करने की तैयारी शुरू कर दी है।

143 वनस्पतियां और 30 पक्षी प्रजातियों का बसेरा

बुधवार को अधिकारियों की टीम के साथ मझौली सागर का निरीक्षण करने पहुंचे डीएम को सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ० आशुतोष कुमार वर्मा ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सौंपी। शुरुआती अध्ययन में सामने आया है कि इस सागर के आसपास वनस्पतियों की 143 प्रजातियां और पक्षियों की 30 प्रजातियां मौजूद हैं। विशेषज्ञ इसे ‘रामसर साइट कैटेगरी-बी’ में शामिल करने के लिए पूरी तरह उपयुक्त मान रहे हैं।

सिद्धार्थनगर की नई पहचान: 'रामसर साइट' बनेगा मझौली सागर, डीएम ने किया निरीक्षण

सिंचाई से लेकर पर्यटन तक, होंगे ये बड़े फायदे

इको-टूरिज्म को बढ़ावा: रामसर साइट घोषित होने के बाद यहाँ अंतरराष्ट्रीय पर्यटक बढ़ेंगे, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा।

भारत-नेपाल सीमा पर पर्यटन: सीमा पर स्थित होने के कारण दोनों देशों के बीच पर्यटकों का आवागमन बढ़ेगा, जिससे अलीगढ़वा (गौतम बुद्ध की क्रीड़ा स्थली) की चमक और बढ़ जाएगी।

जल संरक्षण: सिंचाई विभाग सागर की संचयन क्षमता बढ़ाने के लिए ‘डि-सिल्टिंग’ (सफाई) की योजना बना रहा है, जिससे आसपास के किसानों को सिंचाई में बड़ी राहत मिलेगी।

जैव विविधता: लुप्तप्राय पक्षियों और पौधों का संरक्षण होगा, जिससे पर्यावरण का संतुलन बना रहेगा।

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डीएम के कड़े निर्देश

जिलाधिकारी ने वन विभाग, सिंचाई विभाग और पर्यटन विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि इस परियोजना को लेकर गहन अध्ययन और आवश्यक कागजी कार्यवाही तुरंत शुरू की जाए। निरीक्षण के दौरान तहसीलदार नौगढ़ और ड्रेनेज खंड के अभियंता भी मौजूद रहे।

रिपोर्ट: जाकिर खान

 

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