इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: जमीन अधिग्रहण मामले में ‘रेफरेंस कोर्ट’ को नहीं है रिमांड का अधिकार

Sandesh Wahak Digital Desk: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक कानूनी पेच को सुलझाते हुए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘रेफरेंस कोर्ट’ (संदर्भ न्यायालय) को कलेक्टर द्वारा तय किए गए मुआवजे (अवॉर्ड) को निरस्त कर मामले को दोबारा विचार के लिए वापस भेजने (रिमांड करने) का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति संदीप जैन ने सिद्धार्थनगर जिले से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।

क्या है पूरा मामला? 

यह विवाद सिद्धार्थनगर जिले की इटवा तहसील के ग्राम तेनुआ ग्रांट का है, जहां मैनाराजवाहा निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहित की गई थी। 2010 में प्रक्रिया शुरू हुई और 13 नवंबर 2019 को कलेक्टर ने ₹1.14 करोड़ का मुआवजा तय किया। भूमि मालिकों ने इसे चुनौती दी, जिस पर रेफरेंस कोर्ट ने 25 मार्च 2023 को कलेक्टर के अवॉर्ड को रद्द कर दिया और आदेश दिया कि नए कानून (2013) के तहत दोबारा मुआवजा तय हो।

हाईकोर्ट की टिप्पणी: “रेफरेंस कोर्ट अपीलीय न्यायालय नहीं”

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम (1894 और 2013) के तहत रेफरेंस कोर्ट एक मूल न्यायालय (Original Court) की तरह कार्य करता है। कोर्ट के अनुसार रेफरेंस कोर्ट केवल दो काम कर सकता है। कलेक्टर के अवॉर्ड को बरकरार रख सकता है। या फिर मुआवजे की राशि में वृद्धि कर सकता है। लेकिन, वह अवॉर्ड को निरस्त कर फाइल वापस कलेक्टर को नहीं भेज सकता। कोर्ट ने मामले को दोबारा रेफरेंस कोर्ट में बहाल करते हुए 6 महीने के भीतर निस्तारण का आदेश दिया है।

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