आसाराम को राजस्थान हाई कोर्ट से झटका, उम्रकैद की सजा रहेगी बरकरार, सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद बरी

Sandesh Wahak Digital Desk: नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद आसाराम की याचिका पर राजस्थान उच्च न्यायालय से इस वक्त की सबसे बड़ी कानूनी खबर आ रही है। हाई कोर्ट ने आसाराम को मुख्य मामले में कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया है और निचली अदालत द्वारा उसे सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह से बरकरार रखा है। हालांकि, इस केस में आसाराम को कानूनी तौर पर बेहद मामूली राहत ही मिल सकी है, जबकि उसके साथ नामजद दो अन्य सह-आरोपियों के लिए कोर्ट का यह फैसला बहुत बड़ी राहत लेकर आया है।

बुधवार को राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेन्द्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ (डिवीजन बेंच) ने आसाराम समेत तीनों आरोपियों की तरफ से दायर की गई अपीलों पर यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले से जुड़े सभी पक्षों की दलीलों और अपीलों पर लंबी व विस्तृत सुनवाई मुकम्मल करने के बाद आज अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित से सार्वजनिक किया।

सह-आरोपियों की सजा रद्द

अदालत के इस फैसले में जहां एक ओर मुख्य अभियुक्त आसाराम की आखिरी सांस तक जेल में रहने की सजा को यथावत रखा गया है, वहीं दूसरी तरफ इस मामले में सह-आरोपी बनाई गईं शिल्पी और शरतचंद को हाई कोर्ट ने पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया है। डिवीजन बेंच ने न्यायसंगत समीक्षा करते हुए निचली अदालत (पॉक्सो कोर्ट) द्वारा इन दोनों सह-आरोपियों को दी गई सजा के आदेश को सिरे से खारिज कर दिया, जिससे दोनों को कानूनी रूप से बड़ी कामयाबी मिली है।

साल 2018 में पॉक्सो कोर्ट ने सुनाया था फैसला

गौरतलब है कि आसाराम को जोधपुर के समीप मणाई इलाके में स्थित अपने आश्रम के भीतर एक नाबालिग शिष्या के साथ यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म का दोषी पाया गया था। इस गंभीर मामले की सुनवाई करते हुए साल 2018 में विशेष पॉक्सो अदालत ने आसाराम को कसूरवार ठहराते हुए आजीवन कारावास की कठोर सजा मुकर्रर की थी। निचली अदालत के इसी फैसले को आसाराम द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने भी निचली अदालत के फैसले को सही मानते हुए उस पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है।

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