अल-नीनो हुआ सक्रिय, भारत पर मंडराया सूखे का खतरा, किसानों की बढ़ी चिंता
El Nino Impact On India: भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम पर असर डालने वाली प्राकृतिक जलवायु घटना अल-नीनो एक बार फिर सक्रिय हो गई है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव अगस्त से नवंबर 2026 तक देखने को मिल सकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), अमेरिकी एजेंसी NOAA और भारतीय मौसम विभाग (IMD) की ताजा रिपोर्टों ने चिंता बढ़ा दी है।
खासतौर पर भारत में मानसून पर इसका असर पड़ने की आशंका जताई गई है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो कई क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं। हालांकि अभी देशव्यापी सूखे की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन किसानों और सरकार दोनों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।

क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ी चिंता?
अल-नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है। अल-नीनो बनने पर भारतीय मानसून कमजोर पड़ सकता है। इससे बारिश कम होने, लंबे समय तक बारिश रुकने और कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनने का खतरा बढ़ जाता है।
अमेरिका की आधिकारिक एजेंसी NOAA के क्लाइमेट प्रीडिक्शन सेंटर ने 11 जून 2026 को जारी एडवाइजरी में बताया कि अल-नीनो की स्थितियां मौजूद हैं। प्रभावित समुद्री क्षेत्र में सतह का तापमान सामान्य से लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन की बड़ी चेतावनी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने 2 जून को जारी चेतावनी में कहा कि गर्म समुद्री पानी अल-नीनो को और मजबूत कर रहा है। संगठन के अनुसार जून से अगस्त 2026 के बीच अल-नीनो बनने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक है, जबकि नवंबर तक इसके बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत या उससे ज्यादा बताई गई है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि इसके कारण वैश्विक तापमान बढ़ सकता है। साथ ही सूखा, भारी बारिश और हीटवेव जैसी चरम मौसम घटनाएं भी बढ़ सकती हैं। दक्षिण एशिया में सामान्य से कम बारिश की आशंका भी जताई गई है।
मानसून पर असर और किसानों के लिए खतरा
भारतीय मौसम विभाग ने जून से सितंबर 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून का अद्यतन दीर्घावधि पूर्वानुमान जारी किया है। विभाग के अनुसार मानसून आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ और हिस्सों तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद पूरे मौसम में बारिश के वितरण को लेकर चिंता बनी हुई है।
भारत में जून से सितंबर के बीच खरीफ फसलों के लिए अच्छी मानसूनी बारिश बेहद जरूरी होती है। यदि कहीं बारिश कम हुई या लंबे समय तक बारिश नहीं हुई तो फसलों को नुकसान हो सकता है। धान, दालें, मक्का, सोयाबीन, कपास और मूंगफली जैसी फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं।

किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और पश्चिमी भारत के कई इलाके ज्यादा जोखिम में हैं। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हो सकते हैं।
मध्य भारत को मानसून का मुख्य क्षेत्र माना जाता है। यहां की बारिश देश की बड़ी खरीफ खेती को प्रभावित करती है। यदि यहां बारिश कम होती है तो फसलों के साथ-साथ भूजल, जलाशयों और पशुओं के चारे पर भी असर पड़ सकता है।
सिर्फ कम बारिश ही नहीं, समय भी है महत्वपूर्ण
विशेषज्ञों का कहना है कि सूखा केवल कम बारिश से नहीं होता। बारिश का सही समय पर होना भी उतना ही जरूरी है। यदि जून में अच्छी बारिश हो जाए लेकिन जुलाई और अगस्त में लंबा ड्राई स्पेल आ जाए, तो खेती को भारी नुकसान हो सकता है।
इसी तरह यदि बहुत कम दिनों में अत्यधिक बारिश हो जाए तो पानी बह जाता है और मिट्टी में नमी नहीं टिकती। इसलिए कुल बारिश के साथ उसका वितरण भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो का दोहरा असर
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार अल-नीनो एक प्राकृतिक घटना है और यह पहले भी आती रही है। हालांकि जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है, जिससे इसके प्रभाव और गंभीर हो सकते हैं।
गर्म वातावरण अधिक नमी और ऊर्जा संभालता है। इससे कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखा और कुछ क्षेत्रों में अचानक भारी बारिश की स्थिति बन सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे दोहरा खतरा मान रहे हैं।
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