गंगा घाट पर राहुल गांधी का ‘परशुराम अवतार’, वायरल पोस्टर से छिड़ी नई सियासी बहस
Rahul Gandhi: भारतीय राजनीति में प्रतीकों और संदेशों का खेल हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है। इसी बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन के अवसर पर वाराणसी के गंगा घाट से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने देशभर में नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।
जानकारी के अनुसार, यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का एक विशेष पोस्टर जारी किया, जिसमें उन्हें भगवान परशुराम के अवतार में दिखाया गया है। इस चित्र में उनके एक हाथ में परशुराम का प्रतीक ‘फरसा’ और दूसरे हाथ में भारत का ‘संविधान’ नजर आ रहा है।
राहुल गांधी के पोस्टर का दूध से हुआ अभिषेक
कार्यक्रम के दौरान गंगा घाट पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच इस पोस्टर का दूध से अभिषेक भी किया गया। यह आयोजन केवल जन्मदिन की शुभकामना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके पीछे एक गहरा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस ने इस तस्वीर के जरिए दो बड़े विचारों सामाजिक न्याय (मंडल) और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (कमंडल) के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है।
#WATCH | Varanasi, Uttar Pradesh: Youth Congress performs 'dugdhabhishek' on a poster of Rahul Gandhi. The poster depicts him with an axe of Lord Parshuram on his one hand and Constitution of India in the other.
(Video: Youth Congress, Varanasi) pic.twitter.com/uD3Ct1yjcA
— ANI UP/Uttarakhand (@ANINewsUP) June 19, 2026
परशुराम अवतार से ब्राह्मण वोट बैंक पर नजर
भगवान परशुराम को न्याय और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, खासकर ब्राह्मण समाज की अस्मिता से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में राहुल गांधी को परशुराम के रूप में दिखाना उत्तर प्रदेश सहित हिंदी पट्टी के ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, उनके हाथ में संविधान यह संदेश देता है कि कांग्रेस आज भी लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी पक्षधर है। 2024 के चुनावों में ‘संविधान बचाओ’ नारे की सफलता को भी इससे जोड़ा जा रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रतीकात्मक तस्वीर राहुल गांधी के बदलते राजनीतिक तेवरों को भी दर्शाती है। परशुराम के फरसे को अन्याय के खिलाफ आक्रामकता का प्रतीक माना जाता है, जो उनके सरकार के खिलाफ अधिक सक्रिय और फ्रंट-फुट राजनीति की ओर बढ़ने का संकेत देता है। अब देखना होगा कि ‘फरसा और संविधान’ का यह नया राजनीतिक संदेश आगामी चुनावों में कितना प्रभाव छोड़ पाता है।

