यूपी में गोवंश परिवहन के लिए परमिट जरूरी नहीं, हाईकोर्ट ने जब्ती आदेश किया रद्द

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोवंश के परिवहन और वाहन जब्ती से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश की सीमा के भीतर गोवंश ले जाने के लिए किसी परमिट की जरूरत नहीं है। सिर्फ इस आधार पर कि वाहन बिहार की सीमा से सटे जिले में पकड़ा गया, यह नहीं माना जा सकता कि पशुओं को वध के लिए दूसरे राज्य ले जाया जा रहा था।

न्यायमूर्ति संदीप जैन ने नेशार साह की याचिका पर सुनवाई करते हुए मिर्जापुर के जिलाधिकारी और विंध्याचल मंडल के आयुक्त के जब्ती संबंधी आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने महिंद्रा बोलेरो पिकअप को जब्त करने की कार्रवाई को मनमाना बताया। साथ ही वाहन मालिक की आजीविका छिनने और मानसिक प्रताड़ना के लिए राज्य सरकार को मुआवजा देने का निर्देश दिया। मामले में याची की ओर से अधिवक्ता विपिन कुमार सिंह और सरकार की ओर से सरकारी वकील ने पक्ष रखा।

आठ बैल, एक गाय और बछड़े के साथ पकड़ा गया था वाहन

मामले के अनुसार, 5 फरवरी 2025 को मिर्जापुर जिले की लालगंज पुलिस ने नेशार साह की महिंद्रा बोलेरो पिकअप को रोका था। वाहन में आठ बैल, एक गाय और एक बछड़ा लदे थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि पशुओं को वध के लिए बिहार ले जाया जा रहा था।

इस मामले में गोवध निवारण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद 19 मई 2025 को जिलाधिकारी मिर्जापुर ने वाहन को राज्य सरकार के पक्ष में जब्त करने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ दाखिल निगरानी याचिका को विंध्याचल मंडल के आयुक्त ने भी खारिज कर दिया था।

हाईकोर्ट में याची के अधिवक्ता विपिन कुमार सिंह ने दलील दी कि बोलेरो पिकअप उनके मुवक्किल की आजीविका का एकमात्र साधन है। उन्होंने आरोप लगाया कि रिश्वत नहीं देने पर पुलिस ने दुर्भावना से कार्रवाई की। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि वाहन में न तो गोमांस मिला था और न ही कोई पशु घायल था।

हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ सीमावर्ती जिला होने से तस्करी साबित नहीं

कोर्ट ने कहा कि मिर्जापुर बिहार की सीमा से लगा जिला है, लेकिन केवल इस आधार पर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि पशुओं को वध के लिए बिहार ले जाया जा रहा था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत या गवाह नहीं है, जिससे यह साबित हो कि पशुओं को उत्तर प्रदेश से बाहर ले जाने की योजना थी।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण नियमावली, 1964 के नियम 16 और पहले के न्यायिक फैसलों का हवाला दिया। इसके मुताबिक, परमिट की जरूरत तभी होती है, जब पशुओं को उत्तर प्रदेश की सीमा से बाहर दूसरे राज्य में ले जाया जा रहा हो। राज्य के भीतर गोवंश के परिवहन पर न तो परमिट की बाध्यता है और न ही इस तरह की कोई कानूनी रोक।

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने केस डायरी के आधार पर स्वीकार किया कि पशु चिकित्सा अधिकारी की जांच में सभी मवेशी स्वस्थ पाए गए थे। ऐसे में पशु क्रूरता या गोवध निवारण अधिनियम की धारा 5-बी के उल्लंघन का आरोप भी साबित नहीं हुआ।

कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका का अधिकार सुरक्षित है। बिना कानूनी आधार के किसी व्यक्ति से उसकी रोजी-रोटी का साधन छीनना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

एक सप्ताह में वाहन लौटाने और हर महीने 25 हजार मुआवजे का आदेश

हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी मिर्जापुर के जब्ती आदेश और मंडलायुक्त के रिवीजन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि वाहन एक सप्ताह के भीतर उसके मालिक को सौंप दिया जाए।

इसके साथ ही राज्य सरकार को 5 फरवरी 2025 यानी वाहन जब्त किए जाने की तारीख से उसकी वास्तविक वापसी तक हर महीने 25 हजार रुपये की दर से आर्थिक नुकसान की भरपाई करने का आदेश दिया गया है। इसके अलावा अनावश्यक मुकदमेबाजी और मानसिक प्रताड़ना के लिए 25 हजार रुपये का एकमुश्त अतिरिक्त मुआवजा भी देना होगा।

कोर्ट के मुताबिक, पूरी मुआवजा राशि आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के एक महीने के भीतर चुकानी होगी। तय समय पर भुगतान नहीं होने पर 8 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज भी देना पड़ेगा।

हालांकि, कोर्ट ने राज्य सरकार को यह छूट दी है कि वह अवैध जब्ती के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने के लिए विभागीय जांच करा सकती है। सरकार चाहे तो जांच के बाद संबंधित अधिकारियों से मुआवजे की रकम वसूल सकती है।

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