मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
लखनऊ की वकील पौलोमी पाविनी शुक्ला और आयशा जावेद ने न्याय नारी संगठन की तरफ दाखिल की है पीआईएल
Sandesh Wahak Digital Desk: उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को केंद्र से उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर जवाब मांगा। जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिका में इन प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ये महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण हैं।
याचिका में शरीयत उत्तराधिकार नियम को महिलाओं के खिलाफ बताया भेदभावपूर्ण
यह याचिका लखनऊ की वकील पौलोमी पाविनी शुक्ला और आयशा जावेद द्वारा अपने संगठन ‘न्याय नारी फाउंडेशन’ की ओर से दायर की गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अधिवक्ता निहाल अहमद ने पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि शरीयत के तहत उत्तराधिकार और वसीयत के प्रावधान आवश्यक धार्मिक प्रथाएं नहीं हैं। इसके बाद प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने जवाब मांगते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को नोटिस जारी करने का निर्णय लिया। याचिका में कहा गया है कि वर्तमान शरीयत उत्तराधिकार नियम महिलाओं के खिलाफ स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा, यह कहना कि महिलाओं को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलेगा, स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है। यह एक सिविल मामला है, न कि अनुच्छेद 25 के तहत कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा। उन्होंने यह भी बताया कि वसीयत के मामले में भी एक मुस्लिम अपनी संपत्ति के एक-तिहाई (1/3) से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता। इस प्रकार मुस्लिम अपने स्वयं अर्जित संपत्ति के बारे में भी अपनी इच्छा के अनुसार पूरी तरह वसीयत नहीं कर सकते। 1937 का अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है। उत्तराधिकार से जुड़े मामले दीवानी प्रकृति के होते हैं और ये अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं हैं।
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