अगर दुनिया भारी लगे… तो बच्चों की ओर देखिए- एक उम्मीद भरी नज़र से
“इसे बच्चों के हाथों से उठाओ, ये दुनिया इस क़दर भारी नहीं है….“
ये पंक्तियां जिस समय लिखी गईं शायद उस वक़्त एक थके हुए शायर के हाथों से कलम उस मासूम के हिस्से आ गई, जो अब भी सपनों पर यक़ीन रखता है।
फ़रहत एहसास की यह पंक्ति महज़ एक कविता नहीं, एक दार्शनिक दृष्टिकोण है एक ऐसी दृष्टि जो हमें रोज़मर्रा की जटिलताओं, युद्धों, घृणा, लोभ, और राजनीतिक घुटन से परे ले जाकर मासूमों की दुनिया में खड़ा कर देती है।

ये दुनिया भारी कब हो जाती है?
- दुनिया का वज़न कोई भौतिक माप नहीं, ये हमारी सोच, कर्म और दृष्टिकोण से तय होता है।
- जब बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह युद्ध की कहानियाँ आ जाएँ।
- जब खेल के मैदानों की जगह कोर्टरूम और कमेंट बॉक्स लेने लगें,
- जब सपनों से ज़्यादा स्क्रीन टाइम जरूरी हो जाए,
- तब दुनिया सचमुच भारी लगने लगती है।
- भारी हो जाती है जब मानवीय संवेदनाएँ धर्म, सीमाओं और पहचानों के तले दबने लगे ।
- जब बड़ों ने दुनिया को बोझ बना दिया…
- हम वयस्कों ने इस दुनिया को एजेंडा, आकांक्षाओं और अपनों-ग़ैरों के बोझ से भर दिया है।
- हम बच्चों के लिए शिक्षा की बात करते हैं, लेकिन शिक्षा में रचनात्मकता नहीं, प्रतिस्पर्धा भर दी है।
- हम रिश्तों की बात तो करते हैं, लेकिन अब रिश्ते दिल से नहीं, दिमाग से समझे जाते हैं और गिनती में तौले जाते हैं।
- हमने बच्चों से उनका बचपन तक मांग लिया -कभी नंबरों की दौड़ में, कभी स्क्रीन टाइम के नाम पर।

समाधान क्या हैं?
- इस कविता का उत्तर यही है – मासूमियत को लौटने देना।
- उन आंखों से देखना जिसमें अभी भी सब सरल और सुंदर दिख रहा है।
- दुनिया को उन हाथों में सौंपना जो अभी कोरे हैं –
- जो एक नया संसार गढ़ सकते हैं जहाँ ‘धर्म’ पूजा से ज़्यादा प्रेम बन जाए,
- जहाँ ‘सरहद’ भूगोल की नहीं, दिल की ऊँचाई हो और ‘राजनीति’ सत्ता का नशा नहीं, सेवा का संकल्प हो।
बच्चों के हाथों की ताक़त
बच्चों के हाथों में क्रांति है, अगर हम उन्हें बोझ नहीं, भरोसा सौंपें।
शिकायतों की विरासत देने के बजाय, क्यों न हम उन्हें एक बार ‘समझ’ की किताबें देकर देखें?
समझाएँ और दें सवाल पूछने की आज़ादी।
संक्षेप में शायद ये दुनिया सच में उतनी भारी नहीं है जितना हमने खुद इसे बना डाला है।
कभी मन हल्का करना हो तो एक बार बच्चों का ऐनक पहन कर देखिएगा उनके भोलेपन और बेफिक्र उम्मीदों के साथ। काफी अच्छा महसूस होगा ।
क्योंकि उनमें ना स्वार्थ है, ना एजेंडा, ना द्वेष
उनके पास है केवल एक सपना…एक ऐसी दुनिया जहाँ सब मुस्कुराएँ।
तो अगली बार जब ये दुनिया आपको भारी लगे…
थोड़ी देर किसी बच्चे की हंसी में खुद को खोजिए…
हो सकता है वो मासूमियत ही इस भारी दुनिया की सबसे हल्की और सच्ची दवा हो…
लेखिका – आफरीन बानो


