संपादक की कलम से: नए वर्ल्ड ऑर्डर की आहट
Sandesh Wahak Digital Desk: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मनमाने ढंग से भारत, चीन और ब्राजील पर थोपे गए टैरिफ से एक नए वल्र्ड आर्डर की आहट सुनाई देने लगी है। माना जा रहा है कि भारत-चीन और रूस मिलकर अमेरिकी डॉलर और ट्रंप को सबक सीखाने की तैयारी में जुट गए हैं। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। एक ओर जहां रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन इसी माह भारत की यात्रा पर आ रहे हैं वहीं दूसरी ओर भारत के प्रधानमंत्री गलवान संघर्ष के बाद चीन जाने वाले हैं।
सवाल यह है कि:
- यदि रूस-चीन और भारत अमेरिका के खिलाफ एक महासंघ बनाती है तो इसका दूरगामी असर क्या होगा?
- क्या एक बार फिर दुनिया दो ध्रुवीय होने जा रही है?
- क्या आने दिनों में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को खत्म करने की रणनीति पर इन देशों ने काम करना शुरू कर दिया है?
- क्या अमेरिकी अर्थव्यवस्था और ट्रंप को झटका देने के लिए ये देश ब्रिक्स संगठन का इस्तेमाल करेंगे?
- क्या ट्रंप ने भारत और अमेरिका के रिश्तों को लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंचा दिया है?
ट्रंप ने जिस तरह भारत, चीन व ब्राजील पर टैरिफ थोपा है वह बेहद गंभीर है और इसका उत्तर देने के लिए रूस, चीन और भारत ने कमर कसनी शुरू कर दी है। अभी तक ठंडे बस्ते में पड़े आरआईसी यानी रूस-इंडिया-चीन के बीच महागठबंधन की चर्चा तेज हो गयी है। रूस और चीन दोनों ही भारत को इस संघ में शामिल होने की कई बार पेशकश कर चुके हैं। अब जब अमेरिका ने टैरिफ वार शुरू कर दिया है, चीन-भारत एक साथ आ गए हैं। रूस पहले से भारत के साथ है। अमेरिकी टैरिफ के बदले अभी तक भारत ने अमेरिकी वस्तुओं पर फिलहाल जवाबी टैरिफ नहीं लगाया है लेकिन पीएम मोदी के चीन और रूस के राष्ट्रपति के भारत आने की सूचना बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है।
अमेरिका ने भारत पर लगाया 50 फीसदी टैरिफ
चीन जिस तरह भारत के पक्ष में खड़ा है उससे साफ है कि ये तीनों देश अब मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और डॉलर इकोनॉमी दोनों का सॉलिड जवाब देने की तैयारी कर रहे हैं। अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया है, इसका असर भारत की जीडीपी पर मात्र एक फीसदी पड़ेगा लेकिन इससे अमेरिका में भारतीय वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगेंगे। हालांकि जरूरी वस्तुओं पर ट्रंप ने टैरिफ नहीं लगाया है। ऐसे में भारत इनकी आपूर्ति अमेरिका को करने में भारी कटौती कर सकता है।
इससे वहां जरूरी समानों की किल्लत हो सकती है। इसके अलावा यदि भारत-रूस-चीन के बीच यह समझौता हो गया तो सबसे अधिक नुकसान अमेरिका और डॉलर का होगा। ये तीनों देश मिलकर अपने राष्ट्रीय मुद्रा में व्यापार करेंगे। इससे एशिया से डॉलर चलन से बाहर हो जाएगा। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था रसातल में चली जाएगी। वहीं इन संगठन का अमेरिका समेत कोई भी देश मुकाबला नहीं कर पाएगा। दुनिया में एक नया शक्ति संतुलन स्थापित होगा। हालांकि संगठन कब तक बनेगा यह भविष्य के गर्त में है लेकिन इसकी आहट सुनाई देने लगी है।
सूर्यकांत त्रिपाठी

