जेल की दीवारें पहचान छीन सकती हैं, लेकिन किताबें नई दिशा देती हैं: सिद्धार्थनगर जेल अधीक्षक
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर की जिला जेल अब सिर्फ सजा देने की जगह नहीं, बल्कि कैदियों के जीवन में बदलाव लाने का एक केंद्र बन गई है। जेल अधीक्षक सचिन वर्मा का मानना है कि जेल की चारदीवारी भले ही किसी की सामाजिक पहचान छीन ले, लेकिन किताबें उसे एक नई पहचान, उम्मीद और दिशा दे सकती हैं। जेल में कैदियों के सुधार के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिससे उनकी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव दिख रहा है। जेल के अंदर अब एक आधुनिक लाइब्रेरी, जिम, ध्यान केंद्र और योग अभ्यास की सुविधाएं मौजूद हैं।

लाइब्रेरी क्यों है जरूरी?
जेल अधीक्षक सचिन वर्मा ने बताया कि जेल सिर्फ दंड का नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन और आत्म-सुधार का भी अवसर है। इस प्रक्रिया में किताबें सबसे बड़ा सहारा बनती हैं। उन्होंने कहा कि किताबें कैदी की आत्मा को आवाज देती हैं और उसे यह महसूस कराती हैं कि वह सिर्फ ‘गुनहगार’ नहीं, बल्कि एक इंसान है जिसकी भावनाएं और संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि जेल में लाइब्रेरी होने से कैदियों में यह विश्वास पैदा होता है कि समाज ने उनकी मानवीय गरिमा को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। यह विश्वास उनके पुनर्वास की प्रक्रिया की शुरुआत है।

किताबों से मानसिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता
सचिन वर्मा ने बताया कि जेल की स्थिति अक्सर कैदियों में अवसाद और हताशा बढ़ाती है। ऐसे में किताबें उम्मीद और मार्गदर्शन देती हैं। लाइब्रेरी में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से लेकर स्वरोजगार के लिए जरूरी जानकारी देने वाली किताबें भी उपलब्ध हैं। इससे कैदी न सिर्फ आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि रिहा होने के बाद समाज में एक सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं।
उन्होंने कहा, “लाइब्रेरी में साहित्यिक चर्चा और लेखन कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं, जिससे कैदियों में सामाजिक संवेदनशीलता विकसित होती है।” उनका मानना है कि किताबों से एक इंसान ही नहीं, बल्कि कई परिवारों और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुधर सकता है। सिद्धार्थनगर जिला जेल में इस समय कुल 606 कैदी हैं, जिनमें 47 महिला बंदी और उनके साथ 5 बच्चे भी शामिल हैं।
रिपोर्ट: जाकिर खान
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