डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद जरूरी है C-Peptide टेस्ट
Sandesh Wahak Digital Desk; अगर आपको डायबिटीज है तो आमतौर पर आप ब्लड शुगर की जांच और कभी-कभार HbA1c टेस्ट जरूर कराते होंगे। ये दोनों जांच शुगर लेवल की स्थिति तो बताती हैं, लेकिन शरीर के अंदर असल समस्या क्या है, इसकी पूरी तस्वीर सामने नहीं लातीं। खासतौर पर उन मरीजों के लिए, जिनकी शुगर दवाओं के बावजूद कंट्रोल में नहीं आती या बार-बार दवाएं बदलनी पड़ती हैं, सिर्फ शुगर टेस्ट पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। ऐसे मामलों में C-Peptide टेस्ट बेहद जरूरी हो जाता है।
C-Peptide टेस्ट क्या बताता है
विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटीज के मरीजों में समस्या दो तरह की हो सकती है। या तो शरीर इंसुलिन बना ही नहीं रहा होता या फिर जरूरत के हिसाब से कम या ज्यादा बना रहा होता है। जब पैंक्रियास इंसुलिन बनाता है, उसी प्रक्रिया में एक प्रोटीन भी बनता है, जिसे C-Peptide कहा जाता है। खून में इस प्रोटीन के लेवल की जांच के लिए ही C-Peptide टेस्ट किया जाता है।
दरअसल इस टेस्ट की मदद से डॉक्टर यह समझ पाते हैं कि पैंक्रियास वास्तव में कितना इंसुलिन बना रहा है। अगर C-Peptide का लेवल बहुत कम है तो इसका मतलब है कि पैंक्रियास इंसुलिन बनाना लगभग बंद कर चुका है। अगर लेवल ज्यादा है तो यह संकेत मिलता है कि इंसुलिन तो बन रहा है, लेकिन वह शरीर में ठीक से काम नहीं कर पा रहा। इसी आधार पर यह भी साफ हो जाता है कि मरीज को इंसुलिन की कमी है या फिर इंसुलिन रेज़िस्टेंस की समस्या है।
टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज की पहचान
दरअसल C-Peptide टेस्ट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज में फर्क समझ आ जाता है। जब C-Peptide बहुत कम पाया जाता है तो यह टाइप-1 डायबिटीज की ओर इशारा करता है, क्योंकि इसमें पैंक्रियास इंसुलिन बनाना बंद कर देता है। वहीं अगर C-Peptide का लेवल ज्यादा है तो यह बताता है कि शरीर इंसुलिन बना रहा है, लेकिन उसका सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा, जो टाइप-2 डायबिटीज का संकेत है।
वहीं इस टेस्ट से यह भी तय करने में मदद मिलती है कि मरीज का इलाज टैबलेट से चलेगा या अब इंसुलिन लेना जरूरी हो गया है। कई बार मरीज लंबे समय तक सिर्फ दवाएं लेते रहते हैं, जबकि उनका पैंक्रियास लगभग इंसुलिन बनाना बंद कर चुका होता है। ऐसे में C-Peptide टेस्ट समय पर करा लेने से इलाज की दिशा सही की जा सकती है।
कब कराना चाहिए टेस्ट?
आपको बताते चलें कि, जब दवाओं के बावजूद शुगर कंट्रोल में न आ रही हो, बार-बार लो शुगर की समस्या हो रही हो, यह स्पष्ट न हो पा रहा हो कि डायबिटीज किस प्रकार की है या शुगर लेवल मेंटेन करने में लगातार परेशानी आ रही हो, तब C-Peptide टेस्ट कराना बेहद जरूरी हो जाता है। यह जांच डायबिटीज के सही मैनेजमेंट और बेहतर सेहत की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है।

