सिरदर्द को न करें नजरअंदाज, महिलाओं में बढ़ सकता है Migraine और Stroke का खतरा

Sandesh Wahak Digital Desk: अक्सर महिलाएं अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देती हैं और छोटी-छोटी समस्याओं पर ध्यान नहीं देती हैं। कई बार सिरदर्द को सामान्य थकावट या साधारण दर्द समझकर टाल दिया जाता है। लेकिन कई मामलों में यह साधारण सिरदर्द नहीं बल्कि Women Migraine Risk से जुड़ी एक गंभीर समस्या हो सकती है।

माइग्रेन महिलाओं में तेजी से देखने को मिलने वाली एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो केवल सिरदर्द तक सीमित नहीं रहती बल्कि व्यक्ति की पूरी दिनचर्या को प्रभावित कर सकती है। जो लोग इस समस्या से रोज जूझते हैं, वही इसकी गंभीरता को सही मायनों में समझ पाते हैं।

Migraine क्या है और क्यों होता है गंभीर?

दरअसल माइग्रेन (Migraine) केवल सिर का दर्द नहीं है बल्कि यह दिमाग से जुड़ी एक ऐसी स्थिति है, जो इंसान की सामान्य जिंदगी को प्रभावित कर सकती है। माइग्रेन का दर्द कई बार इतना तेज होता है कि व्यक्ति के लिए सामान्य काम करना भी मुश्किल हो जाता है।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं को माइग्रेन (Migraine) होने का खतरा तीन गुना ज्यादा होता है। इंटरनेशनल विमेंस डे के मौके पर न्यूरोलॉजिस्ट्स ने इस बात पर जोर दिया है कि माइग्रेन को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इसका संबंध दिल और दिमाग की सेहत से भी जुड़ा हो सकता है। कई मामलों में Migraine and Stroke Risk के बीच संबंध भी देखा गया है।

महिलाओं में क्यों ज्यादा होता है माइग्रेन?

एक्सपर्ट्स के अनुसार महिलाओं में माइग्रेन (Migraine) ज्यादा होने के पीछे हार्मोन्स बड़ी भूमिका निभाते हैं। महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन नाम का हार्मोन समय-समय पर बदलता रहता है और यही बदलाव कई बार माइग्रेन को ट्रिगर कर सकता है।

महिलाओं के जीवन के अलग-अलग पड़ाव भी माइग्रेन को प्रभावित करते हैं। पीरियड्स के दौरान कई महिलाओं को सिरदर्द की समस्या बढ़ती हुई महसूस होती है। लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं बताती हैं कि पीरियड्स आने से ठीक पहले उनका सिरदर्द ज्यादा बढ़ जाता है, जिसे Menstrual Migraine कहा जाता है।

वहीं गर्भावस्था के दौरान कई महिलाओं को माइग्रेन (Migraine) से राहत मिल जाती है क्योंकि इस समय हार्मोन अपेक्षाकृत स्थिर हो जाते हैं। वहीं मेनोपॉज के करीब पहुंचने पर हार्मोन्स में भारी उतार-चढ़ाव होता है, जिससे माइग्रेन की समस्या और गंभीर हो सकती है।

माइग्रेन और स्ट्रोक का कनेक्शन

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार Migraine और Stroke के बीच भी एक संबंध पाया गया है। जिन महिलाओं को Aura Migraine होता है, उनमें स्ट्रोक का खतरा उन महिलाओं की तुलना में दोगुना होता है जिन्हें माइग्रेन की समस्या नहीं होती।

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की एक रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि माइग्रेन को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। इसलिए Migraine and Stroke Risk को समझना महिलाओं के लिए बेहद जरूरी माना जाता है।

किन महिलाओं में ज्यादा होता है खतरा?

दरअसल कुछ महिलाओं में Migraine के साथ-साथ Stroke का खतरा ज्यादा देखा जाता है। जिन महिलाओं को हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा या हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या होती है, उनमें यह जोखिम बढ़ सकता है।

इसके अलावा सिगरेट या बीड़ी पीने की आदत, शारीरिक मेहनत की कमी और गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल भी इस खतरे को बढ़ा सकता है। ऐसे मामलों में स्वास्थ्य को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है।

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

अगर माइग्रेन (Migraine) का पैटर्न अचानक बदल जाए या सिरदर्द के साथ कमजोरी महसूस होने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा अगर बोलने में दिक्कत आए या दर्द इतना तेज हो जाए कि सहन करना मुश्किल हो जाए, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है।

लगातार बढ़ता हुआ सिरदर्द भी एक संकेत हो सकता है कि शरीर में कुछ गंभीर समस्या विकसित हो रही है, इसलिए समय पर जांच कराना जरूरी है।

माइग्रेन से बचने के तरीके

दरअसल माइग्रेन (Migraine) से बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि शरीर को पर्याप्त आराम दिया जाए। पूरी और नियमित नींद लेना माइग्रेन को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। रोज एक ही समय पर सोने और जागने की आदत बनाना भी फायदेमंद माना जाता है।

स्ट्रेस भी माइग्रेन को बढ़ाने का बड़ा कारण हो सकता है। ऐसे में योग और मेडिटेशन के जरिए तनाव को कम करने की कोशिश करनी चाहिए। इसके साथ ही शरीर में पानी की कमी नहीं होने देनी चाहिए, क्योंकि डिहाइड्रेशन भी सिरदर्द की समस्या को बढ़ा सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराना भी जरूरी है। ब्लड प्रेशर और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं माइग्रेन (Migraine) को प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए संतुलित खान-पान और नियमित जांच से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

 

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