गुरुग्राम यौन उत्पीड़न मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस को लगाई फटकार, SIT गठन के आदेश

Sandesh Wahak Digital Desk: हरियाणा के गुरुग्राम में चार वर्षीय बच्ची के यौन उत्पीड़न के मामले (Gurugram Sexual Harassment Case) में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने गुरुग्राम पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए उसे फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य सरकार और पुलिस द्वारा पेश की गई स्थिति रिपोर्ट पर असंतोष जताया और मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल यानी SIT के गठन का आदेश दिया।

जांच SIT को सौंपने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस को निर्देश दिया है कि वह इस मामले की पूरी जांच SIT को सौंपे। अदालत ने कहा कि मामले की गहन और निष्पक्ष जांच जरूरी है, जिसे अत्यंत संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ित बच्ची और उसके परिवार की गरिमा बनी रहे।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि गुरुग्राम पुलिस की जांच प्रक्रिया असंवेदनशील, लापरवाह, गैरजिम्मेदार और पूरी तरह गैरकानूनी रही है। इस वजह से पीड़ित बच्ची का मानसिक आघात और बढ़ गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस ने यह साबित करने की कोशिश की कि बच्चे के पास कोई ठोस सबूत नहीं है और माता-पिता की बातें बेतुकी हैं, जबकि मामला स्पष्ट रूप से पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आता है।

गंभीर आरोप को हल्का करने पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि पुलिस ने पहले एफआईआर दर्ज की, लेकिन बाद में अज्ञात कारणों से गंभीर अपराध को धारा 6 से घटाकर धारा 10 कर दिया। अदालत ने इसे बेहद चिंताजनक बताया और कहा कि यह आरोपियों को संरक्षण देने की कोशिश का संकेत देता है।

कोर्ट ने बाल कल्याण समिति यानी CWC के सदस्यों के आचरण पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि उनकी रिपोर्ट ने पीड़ित की पीड़ा को और बढ़ाया है और उनकी योग्यता व भूमिका पर गंभीर संदेह है। साथ ही न्यायिक मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया कि उन्होंने मामले की गंभीरता को समझने में विफलता दिखाई।

अधिकारियों से मांगा गया स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने CWC सदस्यों को 6 फरवरी की रिपोर्ट पर एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। साथ ही हरियाणा सरकार के महिला एवं बाल मंत्रालय के प्रधान सचिव को भी इन सदस्यों की नियुक्ति के कारण बताने और हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया कि गंभीर अपराध को कैसे कम किया गया और CWC की रिपोर्ट को बच्चे के बयान से अधिक महत्व कैसे दिया गया। उन्होंने पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि यदि इतने छोटे बच्चे के मामले में भी कानून की समझ ऐसी है, तो यह बेहद चिंता का विषय है।

असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा करार

मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस और संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई को असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा बताया। उन्होंने कहा कि चार साल की बच्ची की बातों पर अविश्वास जताना शर्मनाक है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि राज्य को कानून का सम्मान है, तो संबंधित अधिकारियों का तत्काल तबादला होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि मामले से जुड़े दस्तावेजों में पीड़ित की पहचान उजागर की गई। अदालत ने इसे गंभीर चूक बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित की पहचान को हर हाल में सुरक्षित रखना चाहिए।

निष्पक्ष और संवेदनशील जांच की जरूरत

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस पूरे मामले में निष्पक्ष, गहन और संवेदनशील जांच बेहद जरूरी है। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो और पीड़ितों को न्याय मिल सके।

 

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