कोर्ट की अवमानना मामले में बायजू रवींद्रन को 6 महीने की जेल

Sandesh Wahak Digital Desk: कभी देश के सबसे बड़े स्टार्टअप्स में शुमार रहे बायजू (Byju’s) के सुनहरे दिन अब गुजरे जमाने की बात हो चली है। एडटेक प्लेटफॉर्म के संस्थापक बायजू रवींद्रन को सिंगापुर की एक अदालत ने संपत्ति का खुलासा न करने और अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए 6 महीने जेल की सजा सुनाई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने रवींद्रन को तत्काल अधिकारियों के सामने सरेंडर करने, कानूनी खर्च उठाने और बीयर इन्वेस्टको प्राइवेट लिमिटेड में अपने मालिकाना हक से जुड़े पुख्ता दस्तावेज जमा करने के सख्त निर्देश दिए हैं।

सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा

इस खबर के बाहर आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर यूजर्स ने तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं। अधिकांश यूजर्स इसे देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए एक बड़ी ‘चेतावनी’ मान रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “बच्चों को पढ़ाने का दावा करने वाली कंपनी का मालिक ‘जब तक सफल न हो जाओ, तब तक सफलता का नाटक करो’ की राह पर चल पड़ा। हद से ज्यादा लालच और दबाव ने इन्हें असली लक्ष्य से भटका दिया। युवाओं के लिए यह एक बड़ी केस स्टडी है।” वहीं कुछ अन्य लोगों ने बायजू के कोर मॉडल पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि जो कंपनी केवल ट्यूटोरियल और पढ़ाई की सामग्री बेच रही थी, वह रातों-रात खुद को ‘टेक दिग्गज’ कैसे बताने लगी?

आर्थिक नाकामी अब तब्दील हुई आपराधिक मामले में

मामले के जानकारों का कहना है कि सिंगापुर कोर्ट का यह फैसला बायजू के पतन की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ है। अदालत द्वारा जेल की सजा सुनाए जाने का सीधा मतलब यह है कि संस्थापक ने जानबूझकर अदालत के आदेशों की अनदेखी की या फिर सबूतों को छिपाने की कोशिश की। इसके बाद अब यह मामला केवल एक वित्तीय विफलता या कॉर्पोरेट घाटा नहीं रह गया है, बल्कि पूरी तरह से एक आपराधिक मामले का रूप ले चुका है।

इस पूरे विवाद पर खुद बायजू रवींद्रन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि सिंगापुर कोर्ट का यह आदेश केवल एक प्रक्रियात्मक मामला है। यह दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से जुड़ा विवाद है, इसमें किसी भी तरह की धोखाधड़ी या वित्तीय हेराफेरी का कोई ठोस आरोप नहीं है। उन्होंने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा, मुझे 15 जून को अदालत में पेश होने के लिए कहा गया है। मेरे पास अभी भी ऊपरी अदालत में अपील करने के विकल्प खुले हैं। रवींद्रन ने यह भी दावा किया कि वह कर्जदाताओं (जीएलएएस ट्रस्ट और कतर निवेश प्राधिकरण) के साथ समझौते के बेहद करीब हैं और विवादित फंड का एक भी हिस्सा व्यक्तिगत तौर पर संस्थापकों को नहीं मिला है।

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