बढ़ती इनपुट लागत से उद्योगों पर दबाव, आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ने के संकेत: क्रिसिल
Crisil Report : हॉर्मुज स्ट्रेट खुलने के बावजूद इस साल उद्योगों के लिए राहत के संकेत सीमित नजर आ रहे हैं। क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को ऊंची इनपुट लागत का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उत्पादन खर्च बढ़ेगा। हालांकि, राहत की बात यह है कि घरेलू बाजार में मांग मजबूत बनी हुई है, जिससे कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ बोझ ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं।
कच्चे तेल और धातुओं की कीमतों ने बढ़ाई मैन्युफैक्चरिंग लागत
रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा कीमतों में उछाल और कच्चे माल की बढ़ती लागत ने उद्योगों पर दबाव बढ़ा दिया है। वित्त वर्ष 2026 में तांबे की औसत कीमत में 8.7 प्रतिशत और एल्युमीनियम में 6.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो इनके दशक भर के औसत महंगाई स्तर से भी ज्यादा है। अप्रैल में तांबे की कीमत 17.3 प्रतिशत, एल्युमीनियम 20.6 प्रतिशत, कच्चे तेल से जुड़ी कीमतें 49.3 प्रतिशत और गैस से जुड़ी कीमतें 19.1 प्रतिशत तक बढ़ीं।

थोक महंगाई के बाद अब उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है असर
क्रिसिल का कहना है कि बढ़ती इनपुट लागत का असर पहले थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में दिखाई देगा, लेकिन जल्द ही इसका असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी पड़ सकता है। यानी आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
वित्त वर्ष 2026 में थोक महंगाई दर सिर्फ 0.7 प्रतिशत रही थी, जबकि गैर-खाद्य वस्तुओं में यह 1.1 प्रतिशत थी। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। क्रिसिल का इनपुट-आउटपुट अनुपात अप्रैल में 1.0 के पार पहुंच गया, जो लगातार 44 महीनों से इससे नीचे बना हुआ था। इससे पहले मार्च 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यह स्तर पार हुआ था।
केमिकल, स्टील, प्लास्टिक और उर्वरक उद्योगों पर सबसे ज्यादा दबाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और खनिज तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर कई उद्योगों पर पड़ रहा है। खासतौर पर स्टील, बेसिक केमिकल्स, उर्वरक, प्लास्टिक, सिंथेटिक रबर, मानव निर्मित फाइबर, अलौह धातु और अन्य औद्योगिक उत्पादों की उत्पादन लागत तेजी से बढ़ी है।
क्रिसिल ने कहा कि पश्चिम एशिया के तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हॉर्मुज क्षेत्र में संकट का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अन्य कच्चे माल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ा है। ऐसे में उद्योगों के लिए लागत प्रबंधन और सरकार के लिए महंगाई नियंत्रण बड़ी चुनौती बन सकती है।

