Agricultural Growth Alert: खेती में मंदी, महंगाई में तेजी! 2026-27 को लेकर एक्सपर्ट्स की चेतावनी
Agricultural Growth Crisis: भारत की अर्थव्यवस्था के लिए साल 2026-27 चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। मौसम विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि मजबूत अल-नीनो (El Niño) और कमजोर मानसून के कारण देश की Agricultural Growth गंभीर दबाव में आ सकती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले वित्त वर्ष में कृषि क्षेत्र की विकास दर या तो शून्य के आसपास रह सकती है या फिर नकारात्मक स्तर तक पहुंच सकती है।
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के प्रोफेसर और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) के पूर्व अध्यक्ष अशोक गुलाटी का कहना है कि यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहा तो Agricultural Growth लगभग शून्य या निगेटिव भी हो सकती है।
उनके मुताबिक भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस वर्ष सामान्य बारिश के दीर्घकालिक औसत (LPA) का केवल 90% वर्षा होने का अनुमान जताया है, जो कृषि क्षेत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।
किसान बदल रहे हैं खेती की रणनीति
कम बारिश की आशंका को देखते हुए कई राज्यों के किसान पहले ही अपनी खेती की योजना बदलने लगे हैं। अधिक पानी मांगने वाली फसलों जैसे धान, गन्ना और सोयाबीन की जगह किसान अब बाजरा, ज्वार, मूंग और अन्य कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
हालांकि इससे पानी की बचत तो होगी, लेकिन किसानों की आमदनी पर सीधा असर पड़ सकता है क्योंकि ये फसलें अपेक्षाकृत कम मुनाफा देती हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि Agricultural Growth Crisis गहराता है तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। ग्रामीण भारत देश की कुल उपभोक्ता मांग का बड़ा हिस्सा है और एफएमसीजी, ऑटोमोबाइल, कृषि उपकरण तथा दैनिक उपभोग वाली वस्तुओं की बिक्री का 30-40 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण बाजारों से आता है।
कृषि आय घटने से ग्रामीण खर्च में कमी आएगी, जिसका असर देश की समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
बढ़ सकती है खाद्य महंगाई
अशोक गुलाटी के अनुसार कमजोर मानसून का असर दालों, तिलहनों, कपास, मोटे अनाज और सब्जियों के उत्पादन पर पड़ सकता है। यदि उत्पादन घटा तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी आ सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई 5 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है और वर्ष के अंत तक 6 प्रतिशत के आसपास पहुंचने की आशंका है।
खाद और डीजल की बढ़ती लागत ने बढ़ाई चिंता
किसानों की परेशानी सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। उर्वरकों की कमी, ग्रे मार्केट में महंगे दामों पर खाद की बिक्री और डीजल कीमतों में बढ़ोतरी से खेती की लागत लगातार बढ़ रही है।
कई इलाकों में किसान सामान्य कीमत से लगभग दोगुनी दर पर खाद खरीदने को मजबूर हैं। वहीं सिंचाई और कृषि मशीनों के संचालन का खर्च भी बढ़ गया है।
खरीफ और रबी दोनों फसलों पर असर का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुपर अल-नीनो जनवरी 2027 तक बना रहता है तो इसका असर केवल खरीफ फसलों पर नहीं बल्कि रबी और जायद सीजन की फसलों पर भी पड़ सकता है। इससे कृषि उत्पादन और किसानों की आय दोनों पर दीर्घकालिक दबाव बन सकता है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि Agricultural Growth को झटका लगता है तो सरकार को किसानों की आय बचाने, ग्रामीण रोजगार बढ़ाने और खाद्य महंगाई नियंत्रित करने के लिए विशेष कदम उठाने होंगे। अन्यथा कृषि संकट का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
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