भूखा रहना मंजूर था, लेकिन पढ़ाई छोड़ना नहीं, बिहार के रफीक का विदेश में बजा डंका
Bihar teacher Uzbekistan: बिहार के गया जिले के इमामगंज क्षेत्र के सिलदहा गांव के रहने वाले रफीक उर रहमान खान की कहानी संघर्ष और हिम्मत की मिसाल है। उनका बचपन नक्सल प्रभावित इलाके में बीता, जहां हर दिन डर और हिंसा का माहौल रहता था।
साल 2000 में नक्सलियों ने उनके नाना राजा खान की हत्या कर दी थी और उनके पिता शफीक उर रहमान खान का अपहरण कर उन्हें प्रताड़ित किया गया था। इस घटना ने पूरे परिवार को हिला दिया था। इसी डर के कारण रफीक और उनके भाइयों को गांव से दूर गयाजी शहर में रखा गया ताकि वे गलत रास्ते पर न जाएं।
गरीबी में पढ़ाई, लेकिन सपना था सिर्फ शिक्षा
रफीक बेहद साधारण परिवार से थे। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन पढ़ाई का जुनून मजबूत था। वे बताते हैं कि पहली बार ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी खरीदने के लिए उनके पिता को 5 महीने तक पैसे जोड़ने पड़े थे। कई बार ऐसा भी हुआ कि रात बिना भोजन के गुजारनी पड़ती थी, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी गई। पिता हर महीने लगभग 200 रुपये भेजकर किसी तरह उनकी पढ़ाई और खर्च चलाते थे।
दिल्ली से उज्बेकिस्तान तक पहुंचा सफर
रफीक ने गयाजी और दिल्ली में पढ़ाई पूरी की और कोचिंग संस्थानों में पढ़ाना शुरू किया। लगभग 20 साल के शिक्षण अनुभव के बाद उन्हें ब्रिटिश काउंसिल और नाटो से जुड़े कार्यक्रम के तहत उज्बेकिस्तान में काम करने का अवसर मिला।
उज्बेकिस्तान में शिक्षक पद पर नियुक्ति
कड़ी मेहनत के बाद अब उन्हें उज्बेकिस्तान के शिक्षा मंत्रालय में शिक्षक पद पर नियुक्त किया गया है। वे भाषा शिक्षा देते हैं और शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग भी आयोजित करते हैं। उन्हें डॉलर में वेतन मिलता है। आज उनकी कहानी पूरे बिहार के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

