अंधेरों से लड़ने का हौसला दे गया नाटक अदृश्य, मंच पर दिखा जिंदगी का अनूठा जज्बा
Lucknow News: जब हौसले बुलंद हों, तो आँखों की रोशनी न होना भी जिंदगी की राह में रोड़ा नहीं बन सकता। कुछ इसी संदेश के साथ लखनऊ के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के मंच पर नाटक ‘अदृश्य’ का बेहद प्रभावशाली मंचन किया गया। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के सहयोग से संस्था ‘विजय बेला – एक कदम खुशियों की ओर’ द्वारा आयोजित इस नाटक ने दर्शकों को न सिर्फ भावुक किया, बल्कि जीवन के प्रति एक नया नजरिया भी दिया।
मुश्किलों में मुस्कुराने की कला
मशहूर लेखक चंद्रशेखर फनसालकर द्वारा लिखित और चन्द्रभाष सिंह के निर्देशन में तैयार यह नाटक एक ‘सेंसिटिव कॉमेडी’ (संवेदनशील हास्य) का बेहतरीन उदाहरण रहा। कहानी का केंद्र ‘कांताबाई’ द्वारा संचालित एक ‘ब्लाइंड्स क्लब’ है।
नाटक में यह बखूबी दिखाया गया कि कैसे दृष्टिहीन लोग अपनी छोटी-छोटी मुश्किलों से हार मानने के बजाय, हास्य और रोमांच के जरिए अपनी दुनिया को रोशन रखते हैं। क्लब के सदस्यों के बीच बुना गया काल्पनिक घटनाक्रम जहाँ एक ओर दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर करता है, वहीं दूसरी ओर उनके संघर्ष और दर्द को गहराई से महसूस भी कराता है।
निराशा के बीच उम्मीद की किरण
निर्देशक चन्द्रभाष सिंह ने अपनी परिकल्पना के जरिए समाज के उन लोगों को आईना दिखाया है जो छोटी-छोटी समस्याओं से टूट जाते हैं। नाटक यह स्थापित करने में सफल रहा कि असली अंधत्व आँखों का नहीं, बल्कि सोच का होता है। साहस और सकारात्मकता (Positive Thinking) के साथ किसी भी कठिन परिस्थिति को जीता जा सकता है। जीवन हर हाल में कीमती है, बस उसे जीने के लिए एक ‘दिव्य दृष्टि’ की जरूरत है।
कलाकारों के अभिनय ने जीता दिल
मंच पर कलाकारों ने अपनी जीवंत प्रस्तुति से दर्शकों को बाँध कर रखा। नाटक में मुख्य रूप से जूही कुमारी, रोहित चौहान, प्रिया बाजपेई और लावण्या वाजपेई ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया। गिरिराज किशोर शर्मा, मुकुल कुमार, उज्ज्वल सिंह और खुद निर्देशक चन्द्रभाष सिंह के अभिनय ने कहानी में नई जान फूँक दी।
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