ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 के विरोध में ऐतिहासिक मार्च, राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन
Lucknow News: नवाबों के शहर लखनऊ की सड़कों पर आज एक अलग ही मंजर देखने को मिला। मौका था ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक 2026 के खिलाफ एक संगठित और पुरजोर राजनीतिक प्रतिरोध का। क्वीयर समुदाय, छात्रों, युवाओं और जागरूक नागरिकों ने एकजुट होकर परिवर्तन चौक से केडी सिंह बाबू स्टेडियम तक मार्च निकाला। यह मार्च सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि अपनी पहचान और संवैधानिक गरिमा को बचाने की एक बड़ी लड़ाई का आगाज़ था।
परिवर्तन चौक से गूंजी अस्तित्व की पुकार
बेगम हज़रत महल पार्क से शुरू हुआ यह मार्च जैसे-जैसे आगे बढ़ा, इसमें जनसैलाब जुड़ता गया। मार्च का संचालन शांतम निधि ने किया, जबकि नेतृत्व पायल, गुड्डन, प्रियंका, यादवेंद्र, आकाश और राजन जैसे प्रमुख चेहरों ने किया।
नारों से गूंजा शहर: ट्रांस राइट्स मानवाधिकार हैं, पहचान पर राज्य का नियंत्रण नहीं चलेगा और संविधान की रक्षा करो जैसे नारों ने सत्ता के गलियारों तक अपनी गूंज पहुंचाई।
साझा एकजुटता: इस विरोध प्रदर्शन में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA), SFI, बापसा (BBAU), एपवा, जन संस्कृति मंच और सीटू (CITU) जैसे संगठनों ने कंधे से कंधा मिलाकर अपनी भागीदारी दर्ज कराई।

पहचान कोई सर्टिफिकेट नहीं, हमारा अधिकार है
मार्च के दौरान वक्ताओं ने इस विधेयक की खामियों पर तीखे प्रहार किए। पायल ने भावुक होते हुए कहा, हमारी पहचान कोई कागज का टुकड़ा या प्रमाणपत्र नहीं है जिसे कोई अधिकारी जारी करे, यह हमारे होने का आधार है। यह बिल हमारी पहचान हमसे छीनकर राज्य के हाथ में देना चाहता है।
गुड्डन और प्रियंका ने चेताया कि यह हमला सिर्फ ट्रांस समुदाय पर नहीं, बल्कि हर नागरिक की निजता पर है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह विधेयक गरिमा के साथ जीने के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। यादवेंद्र और आकाश ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना चर्चा और परामर्श के इस बिल को लाना जनता की आवाज़ को दबाने जैसा है।

राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन सौंपा
प्रदर्शन के अंत में राष्ट्रपति के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में मुख्य रूप से इन बिंदुओं को रेखांकित किया गया।
स्व-पहचान का अंत: विधेयक सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन के अधिकार को खत्म कर इसे मेडिकल जांच और प्रशासनिक मंजूरी के अधीन करता है, जो असंवैधानिक है।
मौलिक अधिकारों का हनन: यह अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव के खिलाफ), 19 (अभिव्यक्ति) और 21 (जीवन की गरिमा) का स्पष्ट उल्लंघन है।
अपराधी बनाने की साज़िश: ज्ञापन में ‘अल्यूर्मेंट’ (प्रलोभन) जैसे अस्पष्ट शब्दों के इस्तेमाल पर चिंता जताई गई, जिनका दुरुपयोग समुदाय के लोगों और उनके मददगारों को अपराधी ठहराने के लिए किया जा सकता है।
Also Read: ‘बारी-बारी से सबको ठोका जा रहा है…’, बागपत में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का बड़ा बयान

