तुलसी का साहित्य लोकमंगल, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा देता है: प्रो. हरीश कुमार शर्मा
Siddharthnagar News: अखिल भारतीय साहित्य परिषद, गोरक्षप्रांत एवं हिंदी विभाग, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु, सिद्धार्थनगर के संयुक्त तत्वावधान में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास की जयंती के अवसर पर हिंदी विभाग में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में वक्ताओं ने तुलसीदास के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता, रामचरितमानस में निहित मानवीय मूल्यों, सामाजिक समरसता, लोकमंगल एवं राष्ट्रीय चेतना पर विचार व्यक्त किए।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. हरीश कुमार शर्मा ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास के विचार और उनकी रचनाएं आज भी समाज के लिए प्रासंगिक और उपयोगी हैं। उनके साहित्य में लोकमंगल की भावना सदियों तक अनुकरणीय रहेगी। तुलसीदास ने अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठ एवं विकसित भारत की जो परिकल्पना प्रस्तुत की, वह आज भी महत्वपूर्ण है। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, सामाजिक समरसता, स्त्री-गरिमा, नैतिकता और लोककल्याण का व्यापक चिंतन दिखाई देता है।

समाज को सकारात्मक दिशा देने में सक्षम है तुलसी का साहित्य
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे ने कहा कि तुलसीदास अत्यंत संवेदनशील कवि थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और प्रवृत्तियों को आधार बनाकर अपनी रचनाओं को आकार दिया। वैज्ञानिक और तकनीकी युग में भी तुलसी का साहित्य समाज को सकारात्मक दिशा देने में सक्षम है। रामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने प्रेम, करुणा, त्याग, मर्यादा और लोकमंगल की ऐसी भावभूमि तैयार की, जिसने उनकी रचनाओं को जन-जन तक पहुंचाया।
अंग्रेजी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. हृदयकांत पांडेय ने कहा कि तुलसी की प्रत्येक रचना में राष्ट्र और सृष्टि को आलोकित करने वाले तत्व निहित हैं। राम राष्ट्र की मर्यादा, कर्तव्य, त्याग और आदर्श के प्रतीक हैं। रामचरितमानस में राष्ट्रीय चेतना का व्यापक स्वरूप दिखाई देता है। तुलसीदास ने राम के चरित्र के माध्यम से आदर्श शासन, आदर्श समाज और लोककल्याण की परिकल्पना को स्वरूप प्रदान किया।

गोस्वामी तुलसीदास के विचार आज भी उपयोगी
विश्वविद्यालय के सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. अविनाश प्रताप सिंह ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास की वाणी और विचार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आज भी उपयोगी हैं। विद्यार्थियों को व्यक्तिगत विकास के साथ समाज और राष्ट्र के विकास के प्रति भी संवेदनशील होकर विचार करना चाहिए। तुलसी का साहित्य व्यक्ति को चिंतनशील बनाने के साथ समाज और राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा देता है।
इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद चौबे ने तुलसीदास के लोकमंगल चिंतन को आज भी प्रासंगिक बताते हुए कहा कि उन्होंने जीवन की समस्याओं के समाधान, मर्यादा, समर्पण, स्नेह और संवेदनशील समाज के निर्माण में अतुलनीय योगदान दिया।

भूगोल विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल गुप्ता ने कहा कि तुलसीदास की रचनाएं समाज में विश्वास, सामाजिक समरसता और सहिष्णुता की भावना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हिंदी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. रेनू त्रिपाठी ने कहा कि तुलसी साहित्य मानवता, नैतिकता, करुणा और जीवन-मूल्यों की प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत है।
कार्यक्रम में प्रथम वर्ष की छात्राओं पुष्पा, शशिकला यादव एवं किरण लोधी सहित सानिया अग्रहरि, श्रृंखला यादव एवं कुशल त्रिपाठी ने भी तुलसीदास के साहित्य और रामचरितमानस की समकालीन प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन एमए के विद्यार्थी अतुल उपाध्याय ने किया तथा आभार ज्ञापन हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. जय सिंह यादव ने किया। इस अवसर पर हिंदी विभाग सहित विभिन्न विभागों के शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
रिपोर्ट- जाकिर खान
Also Read: राम मंदिर जमीन मामले में ‘क्लीन चिट’ पर संजय सिंह का सवाल, SIT को देंगे 26 दस्तावेज

