मुस्लिम रहनुमाई का सबसे बड़ा चेहरा अकेला क्यों पड़ा? सपा की राजनीति पर उठते सवाल…
जब मुस्लिम रहनुमाई का सबसे बड़ा चेहरा अकेला पड़ गया...
Lucknow: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज़म खान (Azam Khan) केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दौर का नाम हैं। मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के साथ समाजवादी पार्टी की नींव रखने वालों में शामिल आज़म खान तीन दशक तक सपा की मुस्लिम राजनीति (Muslim Politics) का सबसे मजबूत स्तंभ रहे। रामपुर उनका गढ़ था, जौहर विश्वविद्यालय उनकी पहचान थी और सरकार हो या संगठन, उनकी बात को नजरअंदाज करना आसान नहीं था। लेकिन आज वही नेता जेल, मुकदमों और राजनीतिक अनिश्चितता के बीच अपनी सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं।
2017 के बाद आज़म खान (Azam Khan) के खिलाफ मुकदमों का सिलसिला तेजी से बढ़ा। भूमि कब्जा, जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद, शत्रु संपत्ति, फर्जी दस्तावेज, चुनावी मामले और अन्य आरोपों ने उन्हें लगातार अदालतों और जेलों के चक्कर में उलझाए रखा। आज़म खान, उनकी पत्नी तंजीन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आज़म तक कानूनी मामलों की जद में आए। कभी रामपुर में जिनकी राजनीतिक हैसियत को चुनौती देना मुश्किल माना जाता था, आज वही परिवार अदालतों और जेलों के बीच फंसा दिखाई देता है।
फरवरी 2020 में जेल जाने के बाद आज़म खान करीब 27 महीने तक सीतापुर जेल में रहे। बाद में उन्हें जमानत मिली, लेकिन दूसरे मामलों में सजा और कानूनी उलझनों ने उनकी मुश्किलें कम नहीं होने दीं। इस पूरे दौर में मुस्लिम समाज और सपा के भीतर से यह सवाल उठता रहा कि क्या पार्टी अपने सबसे बड़े मुस्लिम नेता के लिए वैसा संघर्ष कर रही है, जैसा समाजवादी आंदोलन की परंपरा रही है।
अप्रैल 2022 में शिवपाल यादव सीतापुर जेल पहुंचे थे। बाहर आकर उन्होंने कहा था कि आज़म खान के लिए सड़क से सदन तक संघर्ष दिखाई देना चाहिए था। इसी दौरान आज़म खान के समर्थकों और सपा के कई कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी तेज हुई कि पार्टी नेतृत्व उनके मुद्दे को उतनी प्राथमिकता नहीं दे रहा, जितनी अपेक्षा की जा रही थी।
मुस्लिम समाज के एक हिस्से में यह भावना भी सुनाई देती रही कि जब पार्टी नेतृत्व या यादव परिवार से जुड़े किसी मुद्दे पर समाजवादी पार्टी तत्काल आक्रामक हो जाती है, धरना-प्रदर्शन करती है, प्रतिनिधिमंडल भेजती है और पूरे संगठन को सक्रिय कर देती है, तब आज़म खान के मामले में वैसी राजनीतिक ऊर्जा क्यों नहीं दिखाई दी। यही वजह है कि समय-समय पर यह सवाल उठता रहा कि क्या सपा अपने सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे के लिए उतनी मजबूती से खड़ी हुई, जितनी उसके समर्थक उम्मीद करते थे।
मार्च 2024 में अखिलेश यादव आखिरकार सीतापुर जेल जाकर आज़म खान से मिले। मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि आज़म खान और उनके परिवार के साथ अन्याय हुआ है। लेकिन तब तक यह सवाल राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका था कि जब आज़म खान वर्षों से मुकदमों और जेल की लड़ाई लड़ रहे थे, तब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनके साथ खुलकर खड़ा क्यों नहीं दिखाई दिया।
मुस्लिम राजनीति में Azam Khan का महत्व क्यों रहा?

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 19 प्रतिशत है और 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर उसका सीधा प्रभाव माना जाता है। 2012 में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा समर्थन सपा को मिला तो अखिलेश यादव पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रहे। 2022 और 2024 में भी मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा सपा के साथ दिखाई दिया। यही कारण है कि आज़म खान का मुद्दा केवल एक नेता की कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि मुस्लिम प्रतिनिधित्व, राजनीतिक सम्मान और नेतृत्व की हिस्सेदारी से जुड़ा सवाल बन चुका है।
राजनीतिक गलियारों में यह बहस भी समय-समय पर उठती रही है कि मुलायम सिंह यादव के बाद सपा का पूरा नेतृत्व अखिलेश यादव के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया। ऐसे में मुस्लिम समाज का एक वर्ग यह सवाल पूछता है कि क्या पार्टी में आज़म खान जैसे जनाधार वाले नेताओं की भूमिका धीरे-धीरे सीमित होती गई।
आज रामपुर की राजनीति बदल चुकी है, जौहर विश्वविद्यालय विवादों में है, परिवार कानूनी लड़ाइयों में उलझा है और खुद आज़म खान जेल में हैं। लेकिन उनके समर्थकों के मन में आज भी एक टीस है कि सपा मुखिया ने पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे के लिए उतनी मजबूती से लड़ाई नहीं लड़ी, जितनी पूरी कौम उम्मीद कर रही थी, इसी का नतीजा रहा कि आज़म खान अपनी सबसे कठिन लड़ाई में धीरे-धीरे अकेले पड़ गए!
रफ़ी अहमद किदवई से आज़म खान तक: मुस्लिम सियासत का सिकुड़ता दायरा
आजादी के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में रफ़ी अहमद किदवई, हाफिज मोहम्मद इब्राहिम, शफीकुर्रहमान बर्क, सलमान खुर्शीद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और आज़म खान जैसे नेताओं ने अलग-अलग दौर में मुस्लिम समाज की आवाज़ को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया। लेकिन जनाधार, संगठन, सरकार और सड़क, चारों स्तरों पर प्रभाव की बात करें तो आज़म खान (Azam Khan) पिछले तीन दशकों के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं में गिने जाते हैं।
दस बार विधायक (एक अदालती मामले में सजा होने पर अक्टूबर 2022 में उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द कर दी गई थी, उस लिहाज से नौ बार), सांसद, राज्यसभा सदस्य, नेता प्रतिपक्ष और कैबिनेट मंत्री रहे आज़म खान केवल एक नेता नहीं, बल्कि मुस्लिम राजनीति की यूनिवर्सिटी बन गए थे।
आज स्थिति यह है कि प्रदेश की लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के बावजूद ऐसा सर्वमान्य और प्रदेशव्यापी प्रभाव वाला मुस्लिम चेहरा दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि आज़म खान की जेल यात्रा को कई लोग सिर्फ एक नेता के साथ घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के रूप में नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम नेतृत्व के कमजोर पड़ने की कहानी के रूप में देखते हैं।
मुस्लिम मतदाता आज भी बड़े पैमाने पर सपा के साथ खड़ा दिखाई देता है, क्योंकि उसके सामने कोई मजबूत राजनीतिक विकल्प नहीं है। लेकिन उसके भीतर यह सवाल जरूर मौजूद है कि सत्ता के समीकरणों में उसकी भूमिका सिर्फ वोटर की है या नेतृत्व की भी। Azam Khan का प्रकरण इसी अनकहे सवाल को सबसे ज्यादा ताकत से सामने लाता है।
रिपोर्ट: चेतन गुप्ता
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