हैदराबाद यूनिवर्सिटी में छात्रों ने लेखिका नीरजा माधव के खिलाफ किया प्रदर्शन, माफी मांगने का दबाव

Sandesh Wahak Digital Desk: हैदराबाद विश्वविद्यालय (HCU) के हिंदी विभाग में आयोजित एक सेमिनार के दौरान उस समय तनाव व्याप्त हो गया, जब प्रख्यात लेखिका और विचारक डॉ. नीरजा माधव को छात्रों के विरोध और हिंसक नारेबाजी का सामना करना पड़ा। मामला ‘थर्ड जेंडर’ (किन्नर विमर्श) और भारतीय संस्कृति से जुड़ा था, जिस पर लेखिका के स्पष्ट विचारों से कुछ छात्र संगठन भड़क गए।

डॉ. नीरजा माधव को विश्वविद्यालय में थर्ड जेंडर विषय पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था। चर्चा के दौरान जब उन्होंने भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में अपनी बात रखी, तो प्रश्नकाल में कुछ छात्रों ने समलैंगिकता और मनुस्मृति को लेकर सवाल दागे।

नीरजा माधव ने तर्क दिया कि समलैंगिकता व्यक्तिगत इच्छा या मानसिक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इसे थर्ड जेंडर की प्राकृतिक स्थिति के साथ मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने छात्रों से यह भी पूछा कि कितने लोगों ने मूल मनुस्मृति पढ़ी है? जिसका कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी ग्रंथ का खंडन करने से पहले उसे पढ़ना जरूरी है।

Neerja Madhav

घेराबंदी और नारेबाजी

सत्र खत्म होने के कुछ ही देर बाद आईसा (AISA) और एसएफआई (SFI) से जुड़े सैकड़ों छात्रों ने नीरजा माधव की कार को घेर लिया। छात्र उन पर अपने बयानों के लिए माफी मांगने का दबाव बनाने लगे।

लेखिका का कड़ा रुख: नीरजा माधव कार से बाहर निकलीं और डंके की चोट पर कहा, मैंने जो कहा वह सत्य है। आपकी असहमति हो सकती है, लेकिन मैं माफी नहीं मांगूंगी।

बढ़ा तनाव: इसके बाद छात्र और उग्र हो गए और मोदी-संघ विरोधी नारे लगाने लगे। करीब 15-20 मिनट की मशक्कत के बाद सुरक्षाकर्मियों ने लेखिका को सुरक्षित बाहर निकाला।

हिंदी बनाम अंग्रेजी पर भी हुई बहस

सेमिनार के दौरान एक वाकया यह भी रहा कि जब एक छात्रा ने लेखिका से अंग्रेजी में सवाल पूछने की कोशिश की, तो उन्होंने टोकते हुए कहा, आप हिंदी विभाग की छात्रा हैं, तो हिंदी में ही बात करें। इस पर भी छात्रों ने विरोध जताया।

साहित्यकारों ने जताई चिंता

इस घटना की चौतरफा निंदा हो रही है। वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने इसे ‘घोर असहिष्णुता’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में लेखकों की अभिव्यक्ति की आजादी छीनना और सच स्वीकार न कर पाने पर हिंसा पर उतर आना राष्ट्र को कमजोर करने वाली मानसिकता है।

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