संसद में ड्रेस कोड पर सियासत, BJP नेता की मांग पर कांग्रेस ने जताया विरोध
Sandesh Wahak Digital Desk: संसद का बजट सत्र जारी है और इसी बीच ड्रेस कोड (Dress Code) को लेकर नई बहस छिड़ गई है। मध्य पूर्व संकट और देश में बढ़ती गैस की किल्लत के बीच सांसदों के पहनावे पर सवाल उठने लगे हैं। यहां भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने संसद में आने वाले सांसदों के लिए ड्रेस कोड लागू करने की मांग करते हुए कहा कि संसद लोकतंत्र का मंदिर है और यहां कुछ खास तरह के कपड़े पहनने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
वकील और डॉक्टर की तरह हो ड्रेस कोड
जयवीर शेरगिल ने अपने बयान में कहा कि जिस तरह वकीलों और डॉक्टरों के लिए एक तय ड्रेस कोड होता है, उसी तरह सांसदों के लिए भी होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई वकील टी-शर्ट और कार्गो पैंट पहनकर कोर्ट नहीं जा सकता और कोई डॉक्टर हाफ पैंट में ऑपरेशन थिएटर में प्रवेश नहीं कर सकता, तो फिर सांसदों को ऐसे कपड़े पहनकर संसद आने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए।
राहुल गांधी के पहनावे पर इशारा
इस बयान को राहुल गांधी के पहनावे से जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि वह कई मौकों पर संसद में टी-शर्ट और कार्गो पैंट पहनकर पहुंचे हैं। हालांकि शेरगिल ने साफ किया कि उन्होंने अपने ट्वीट में राहुल गांधी का नाम नहीं लिया था, लेकिन कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया से उन्हें लगा कि उनकी बात सही दिशा में थी।
जयवीर शेरगिल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए भी कहा कि संसद में ‘नॉट अलाउड’ ड्रेस कोड लागू होना चाहिए, जिसकी शुरुआत टी-शर्ट और खुली शर्ट पर रोक से होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संसद कोई क्लब लाउंज नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मंदिर है, इसलिए इसकी गरिमा बनाए रखना जरूरी है।
कांग्रेस नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
इस मांग के सामने आते ही कांग्रेस नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस सांसद अशोक सिंह ने इसे अनावश्यक बताते हुए कहा कि इस तरह किसी एक नेता को निशाना बनाना संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है।
वहीं पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग ने भी इस प्रस्ताव की आलोचना की। उन्होंने कहा कि आज ड्रेस कोड की बात हो रही है, तो कल यह भी तय किया जा सकता है कि कौन से रंग के कपड़े पहने जाएं, जो पूरी तरह से अनावश्यक है।
संसद की गरिमा पर छिड़ी बहस
ड्रेस कोड को लेकर उठी यह बहस अब संसद की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन के सवाल को सामने ला रही है। एक ओर इसे अनुशासन और मर्यादा से जोड़ा जा रहा है, तो दूसरी ओर इसे अनावश्यक हस्तक्षेप बताया जा रहा है, जिससे राजनीतिक माहौल और गरमा गया है।
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