‘हाइमन फटा था’ कहकर नहीं बच सकता आरोपी, Allahabad HC की रेप केस पर बड़ी टिप्पणी
Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने रेप से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि रेप एक कानूनी (Legal) शब्द है, मेडिकल (Medical) नहीं। यदि किसी पीड़िता का हाइमन पहले से फटा हुआ पाया जाता है, तो केवल इसी आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है, तो मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन के पुराने फटे होने का उल्लेख आरोपी को संदेह का लाभ देने का आधार नहीं बन सकता।
यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने 1982 के एक रेप केस की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी।
Allahabad High Court बोला- हाइमन कई वजहों से फट सकता है
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाइमन का फटना केवल यौन संबंध का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह खेलकूद, साइकिल चलाने, जिम्नास्टिक, घुड़सवारी, दुर्घटना या अन्य शारीरिक गतिविधियों की वजह से भी फट सकता है। इतना ही नहीं, कुछ महिलाओं में जन्म से ही हाइमन नहीं होता या वह इतना लचीला होता है कि यौन संबंध बनने के बाद भी नहीं फटता।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन के अनुसार, फरवरी 1982 में 15 वर्षीय किशोरी गांव के बाहर शौच के लिए गई थी। इसी दौरान आरोपी ने अपने साथी के साथ मिलकर उसके साथ दुष्कर्म किया और विरोध करने पर मारपीट भी की। मामले की सुनवाई के बाद 1983 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता का हाइमन पहले से फटा हुआ बताया गया है, इसलिए वह पहले से यौन संबंध बनाने की आदी थी और उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ। कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को नकारा नहीं जा सकता।
50 हजार रुपये का जुर्माना, 10 दिन में सरेंडर का आदेश
Allahabad High Court ने आरोपी की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उस समय लागू कानून के अनुसार जुर्माना नहीं लगाया था, जो कानूनी रूप से उचित नहीं था। अदालत ने आरोपी पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया और उसकी जमानत रद्द करते हुए 10 दिन के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि रेप जैसे गंभीर अपराध में प्रोबेशन का लाभ देना समाज के लिए गलत संदेश होगा।
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