रामपुर तिराहा कांड में 31 साल बाद मिला इंसाफ, तत्कालीन SO समेत 3 पुलिसकर्मियों को सजा
Rampur Tiraha Kand: उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हुए चर्चित रामपुर तिराहा कांड में 31 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। फर्जी हथियार बरामदगी का मामला दर्ज कर आंदोलनकारियों को झूठे केस में फंसाने के आरोप में तत्कालीन थाना प्रभारी (SO) ब्रज किशोर सिंह और दो पुलिसकर्मियों उमेश चंद व अनिल कुमार को दोषी करार दिया गया है।
सीबीआई के विशेष न्यायाधीश देवेंद्र सिंह फौजदार की अदालत ने तीनों को डेढ़-डेढ़ साल की सजा और 21-21 हजार रुपये जुर्माना लगाया। हालांकि सजा सुनाने के बाद अदालत ने उन्हें व्यक्तिगत मुचलके (पर्सनल बॉन्ड) पर रिहा भी कर दिया।
क्या था Rampur Tiraha Kand?
एक अक्टूबर 1994 को अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी दिल्ली के राजघाट की ओर जा रहे थे। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने उन्हें रोक लिया। इसी दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच टकराव हुआ, जिसके बाद पुलिस फायरिंग में सात आंदोलनकारियों की मौत हो गई। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
घटना के बाद पुलिस ने आंदोलनकारियों के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज किए। इनमें एक मुकदमा तमंचा और खुखरी बरामद होने का भी था। आरोप था कि तत्कालीन झिंझाना थाना प्रभारी ब्रज किशोर सिंह ने आंदोलनकारियों को हिंसक साबित करने के लिए फर्जी हथियार बरामदगी का केस तैयार कराया।
बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच में सामने आया कि हथियार बरामदगी का पूरा मामला फर्जी था। इसके बाद सीबीआई ने तत्कालीन एसओ और उनके साथ मौजूद दो पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, झूठा मुकदमा दर्ज करने, फर्जी साक्ष्य तैयार करने और पद का दुरुपयोग करने समेत कई धाराओं में चार्जशीट दाखिल की।
कोर्ट ने सुनाई सजा, लेकिन उम्र का भी रखा ध्यान
लंबी सुनवाई, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी माना। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 182, 211, 218 और आयुध अधिनियम की धारा 25 के तहत सजा सुनाई।

सभी सजाएं एक साथ चलेंगी, इसलिए तीनों को डेढ़ वर्ष के साधारण कारावास और 21 हजार रुपये जुर्माने की सजा मिली। अदालत ने यह भी माना कि मुकदमा करीब तीन दशक तक चला और आरोपी अब अधिक उम्र के हैं, इसलिए उन्हें पर्सनल बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया। नियमित जमानत के लिए वे अदालत में आवेदन करेंगे।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
Rampur Tiraha Kand पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि जब राज्य के कर्मचारी ही निर्दोष नागरिकों को फंसाने के लिए आपराधिक षड्यंत्र रचते हैं और फर्जी साक्ष्य गढ़ते हैं, तो यह केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था और संवैधानिक व्यवस्था पर हमला होता है। अदालत ने कहा कि कानून लागू कराने वालों की पहली जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा करना है, न कि उन्हें झूठे मामलों में फंसाना।
सीबीआई ने इस मामले में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गृह सचिव हरिश्चंद्र सिंह को भी गवाह बनाया था। उन्होंने अदालत में बताया कि उन्होंने 14 जुलाई 1995 को पुलिसकर्मियों के खिलाफ शस्त्र अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। उनके बयान को भी अदालत ने महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।
Rampur Tiraha Kand में पहले भी हुई थी सजा
इसी कांड से जुड़े दुष्कर्म और लूट के एक अन्य मामले में मार्च 2024 में अदालत ने दो पूर्व पीएसी जवानों मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और एक-एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस ताजा फैसले के साथ रामपुर तिराहा कांड के एक और महत्वपूर्ण अध्याय का कानूनी निपटारा हो गया।
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