जन आंदोलन के सामने 12 साल में तीसरी बार बदली मोदी सरकार की चाल

Sandesh Wahak Digital Desk: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भले ही एक राजनीतिक फैसला हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे मोदी सरकार के सामने आए सबसे बड़े जनआंदोलनों की श्रृंखला में तीसरी घटना मान रहे हैं। पहले CAA-NRC के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन, फिर तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन और अब NEET पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का स्वतःस्फूर्त विरोध – तीनों बार सरकार को जनाक्रोश के सामने झुकना पड़ा है। ये तीनों घटनाएं दिखाती हैं कि आज भी लोकतंत्र में संगठित और सतत जनदबाव सत्ता की दिशा बदलने की ताकत रखता है।

विरोध को हल्का लेना, फिर पीछे हटना

मोदी सरकार के रुख में एक स्पष्ट पैटर्न दिखता है- विरोध को शुरू में कमतर आंकना, आंदोलन की नैतिक ताकत को स्वीकारने से बचना और तब तक अपने रुख पर कायम रहना, जब तक कि विरोध की राजनीतिक कीमत पीछे हटने की कीमत से अधिक न हो जाए। यही रणनीति CAA-NRC विरोध, किसान आंदोलन और अब पेपर लीक विरोध में देखी गई। हर बार सरकार को जनदबाव के आगे झुकना पड़ा, हालांकि पहली बार उसे औपचारिक रूप से कदम वापस नहीं लेने पड़े, लेकिन योजना ठंडे बस्ते में चली गई।

पहली बार: CAA-NRC विरोध और राष्ट्रीय नागरिक पंजी का मामला

2019 में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छिड़ा था। केंद्रीय गृह मंत्री लगातार देशव्यापी NRC की बात कर रहे थे और इसकी प्रक्रिया का सार्वजनिक उल्लेख भी कर चुके थे। लेकिन व्यापक विरोध के बाद प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा कि सरकार ने NRC लागू करने का कोई निर्णय नहीं लिया है। औपचारिक रूप से कोई अधिसूचना वापस नहीं ली गई, क्योंकि इसे लागू करने की घोषणा ही नहीं हुई थी, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह स्पष्ट संकेत था कि सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं।

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दूसरी बार: किसान आंदोलन और तीनों कानून वापस

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ लगभग एक वर्ष तक चले किसान आंदोलन ने सरकार को बड़े पैमाने पर झुकने पर मजबूर कर दिया। शुरुआत में सरकार ने आंदोलन को सीमित क्षेत्र का बताकर खारिज कर दिया और इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश की, लेकिन किसानों ने अपना संघर्ष जारी रखा। अंततः प्रधानमंत्री ने स्वयं तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की और किसानों से क्षमा भी मांगी। यह मोदी सरकार की ऐसी दुर्लभ स्वीकारोक्ति थी, जिसमें जनदबाव के सामने पीछे हटने की साफ झलक दिखी।

तीसरी बार: NEET पेपर लीक विरोध और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा

इस बार का आंदोलन अपने स्वरूप में बिल्कुल अलग था। यह किसी एक संगठन, राजनीतिक दल या स्थापित नेतृत्व के नियंत्रण में नहीं था। यह स्वतःस्फूर्त, विकेंद्रित और युवाओं द्वारा संचालित आंदोलन था, जिसमें भीड़ ही नेतृत्व थी और आवाज भी। सरकार पारंपरिक राजनीतिक वार्ता की रणनीति नहीं अपना सकी, क्योंकि बातचीत के लिए कोई एक चेहरा मौजूद नहीं था।

युवाओं ने सोशल मीडिया के जरिए आंदोलन को नई ऊर्जा दी। व्यंग्य, हास्य और रचनात्मक संदेशों से भरे वीडियो और चित्रों ने आंदोलन को व्यापक सांस्कृतिक पहचान दी। आंदोलन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन उसका विस्तार इतना तेज था कि सरकार की प्रतिक्रिया हमेशा धीमी पड़ गई।

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विरोध को दबाने की कोशिश उल्टी पड़ी

20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुई पुलिस कार्रवाई आंदोलन को रोकने के बजाय उसे और मजबूत करने वाली साबित हुई। सामान्यतः सरकारें ऐसे आंदोलनों से निपटने के लिए नेतृत्व को निशाना बनाती हैं, विरोधी समूहों में विभाजन पैदा करती हैं या समय के साथ आंदोलन के कमजोर पड़ने का इंतजार करती हैं। लेकिन इस बार युवाओं का आंदोलन इन सभी पारंपरिक राजनीतिक उपायों से अप्रभावित रहा। जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपना रुख नरम किया, तब भी छात्र शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर कायम रहे।

BJP के अपने वोट बैंक में दरार

इस आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक बात यह रही कि इसमें बड़ी संख्या उन छात्रों और युवाओं की थी, जो मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग से आते हैं और जिन्हें भाजपा का पारंपरिक समर्थक आधार माना जाता है। राजनीतिक विरोधियों के आंदोलन को सरकार वैचारिक या दलगत कहकर खारिज कर सकती है, लेकिन जब असंतोष अपने ही समर्थक वर्ग के बीच दिखने लगे, तो उसे नजरअंदाज करना असंभव हो गया। यही कारण है कि सरकार ने पहली बार महसूस किया कि व्यवस्था के प्रति नाराजगी अब विपक्षी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रही।

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