धर्म नहीं, प्रकृति प्रेम ही सर्वोपरि: स्वामी चिदानंद ने देशवासियों से की ये अपील
Sandesh Wahak Digital Desk: धर्मनगरी हरिद्वार स्थित परमार्थ निकेतन आश्रम (‘लोककल्याण’ का भाव) के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज लगातार मानवता, प्रकृति और भगवत भाव से जुड़े प्रेरणादायी संदेश दे रहे हैं। उनका मानना है कि जीवन को सार्थक और उपयोगी बनाने का मार्ग प्रकृति के संरक्षण से होकर गुजरता है।
स्वामी चिदानंद महाराज ने देशवासियों से आह्वान किया है कि ‘न जाति से न धर्म से अपनी सार्थकता बढ़ाये अपने अपने कर्म से‘ करें। चिदानंद महाराज ने देशवासियों से अपील की वे अपने जन्मदिन और वर्षगांठ को सिर्फ मनाने के बजाय, संसार के कल्याण हेतु वृक्षारोपण भी करें। उन्होंने एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा, “आप जितने साल के हो जाएं, कम से कम उतने ही पौधे लगाकर इस संसार को वृक्ष दान करें।”
वृक्षारोपण: दस पुत्रों के समान
स्वामी जी के अनुसार, वृक्षारोपण हमें प्रकृति के साथ गहरा जोड़ता है और जीवन को सार्थक बनाता है। भारतीय संस्कृति में कहा गया है, “एक वृक्ष दस पुत्र समाना”। वृक्षों का दान करके हम न केवल पर्यावरण को संरक्षित करते हैं, बल्कि अपने भविष्य को सुरक्षित बनाते हैं और आध्यात्मिक विकास को भी बढ़ावा देते हैं। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि प्रकृति प्रेम के इस कार्य में न कोई जाति है, और न ही कोई धर्म, बल्कि यह शुद्ध रूप से मानव रक्षा और प्रकृति प्रेम है।
संदेश का महत्व
स्वामी चिदानंद सरस्वती का यह प्रेरणादायी संदेश कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
- जीवन को सार्थक बनाना: यह संदेश हमें सिखाता है कि हम भौतिक उपलब्धियों के साथ-साथ प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य को समझें और जीवन को सार्थक बनाएं।
- पर्यावरण संरक्षण: यह हमें पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझने और इसे अपने दैनिक जीवन में लागू करने के लिए प्रेरित करता है।
- आध्यात्मिक विकास: वृक्षारोपण जैसे निःस्वार्थ कार्यों के माध्यम से हम अपने मनोभावों को ईश्वर के साथ जोड़कर आध्यात्मिक विकास के मार्ग पर चल सकते हैं।
स्वामी चिदानंद सरस्वती जी के इस संदेश का अनुसरण करके, हम सभी अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण में एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
रिपोर्ट: डॉ चन्द्र किशोर शर्मा
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