इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने रद्द किया बर्खास्ती का आदेश, 26 जूनियर इंजीनियरों की नौकरी बहाल

Lucknow News: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश जल निगम के 2013 भर्ती मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने सामान्य श्रेणी (जनरल कैटेगरी) के दो दर्जन से अधिक जूनियर इंजीनियरों (JE) को नौकरी से हटाने के वर्ष 2015 के प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि भर्ती प्रक्रिया में अधिकारियों से कोई त्रुटि हुई है, तो उसकी सजा निर्दोष कर्मचारियों को नहीं दी जा सकती।

जस्टिस इरशाद अली की एकल पीठ ने राकेश प्रताप सिंह और 25 अन्य जूनियर इंजीनियरों की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत पदों पर नियमित चयन प्रक्रिया के तहत नियुक्त किया गया था। कर्मचारियों पर किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, गलत सूचना देने या हेरफेर करने का कोई आरोप नहीं था। अदालत ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के 28 जनवरी 2014 के आदेश को भी क्षेत्राधिकार से बाहर मानते हुए रद्द कर दिया और कहा कि बिना कानूनी आधार वाले आदेश पर की गई प्रशासनिक कार्रवाई को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

470 पदों से शुरू हुआ विवाद और 543 तक पहुंची नियुक्तियां

यह पूरा विवाद वर्ष 2013 में जल निगम द्वारा जूनियर इंजीनियरों के 470 पदों पर निकाली गई भर्ती से जुड़ा है। प्रारंभिक चयन प्रक्रिया के बाद आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों के चयन को लेकर आपत्तियां उठी थीं, जिसके बाद 7 जनवरी 2014 को तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई। याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्र ने अदालत में तर्क दिया कि समिति ने 15 जनवरी 2014 की रिपोर्ट में यह स्पष्ट सिफारिश की थी कि आरक्षित श्रेणी के अतिरिक्त योग्य अभ्यर्थियों को दूसरे चरण की 469 रिक्तियों में समायोजित किया जाए, और पहले से चयनित किसी भी सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थी को हटाया न जाए।

अधिकारियों ने सिफारिश मानते हुए 136 अतिरिक्त SC/OBC अभ्यर्थियों को नियुक्त कर दिया, जिससे कुल नियुक्तियों की संख्या 543 हो गई। हालांकि, 2 दिसंबर 2014 और बाद में 14 मई 2015 को राकेश प्रताप सिंह सहित सामान्य श्रेणी के 73 जूनियर इंजीनियरों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। हाई कोर्ट ने अधिकारियों की इस कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘कारण बताओ नोटिस’ महज एक औपचारिकता नहीं हो सकता और वित्तीय कठिनाई या गलत प्रक्रिया का हवाला देकर मनमाना फैसला नहीं थोपा जा सकता।

कोर्ट ने 14 मई 2015 के बर्खास्ती आदेश को रद्द करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं को सेवा में बने रहने का निर्देश दिया है। अदालत ने आदेश दिया है कि ये सभी कर्मचारी अपनी मूल नियुक्ति तिथि, यानी 21 अक्टूबर 2013 से निरंतर सेवा और नियमानुसार मिलने वाले सभी लाभों के पूर्ण हकदार होंगे।

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