जिला अदालत परिसर में वकीलों के अवैध कब्जों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट के आदेश में दखल से किया इनकार
Sandesh Wahak Digital Desk: जिला अदालत परिसर के आसपास सार्वजनिक जमीनों और आम रास्तों पर अवैध अतिक्रमण कर बनाए गए वकीलों के चैंबर व अन्य अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सेंट्रल बार एसोसिएशन (लखनऊ) की याचिका को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें करीब 72 कथित कब्जाधारियों को नोटिस जारी कर जमीन या निर्माण पर अपना वैध अधिकार साबित करने या कब्जा हटाने के निर्देश दिए गए थे।
बार एसोसिएशन में पद होने से अवैध निर्माण को संरक्षण नहीं मिलेगा: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि बार एसोसिएशन में किसी पद पर आसीन होना या वकीलों का पेशा होना किसी सार्वजनिक जगह या मुख्य सड़क पर अनधिकृत कब्जे का अधिकार नहीं देता। पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि गैर-कानूनी निर्माणों को किसी भी आधार पर कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकता और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर स्टे (रोक) लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।
ट्रैफिक बाधा और सुरक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता
जस्टिस विक्रम नाथ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपने वरिष्ठ न्यायाधीश के कार्यकाल का अनुभव साझा करते हुए कहा कि सड़कों के किनारे किए गए इन अस्थायी व स्थायी निर्माणों से न केवल रास्ते अवरुद्ध होते हैं, बल्कि यातायात व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित होती है। वहीं, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ ने कोर्ट परिसरों की सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि अदालती परिसरों के आसपास ही इस तरह से अतिक्रमण होने लगेगा तो सुरक्षा सुनिश्चित करना नामुमकिन हो जाएगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाला द्वारा प्रभावित अधिवक्ताओं के लिए वैकल्पिक जगह मुहैया कराने और मामले को मध्यस्थता से सुलझाने के दिए गए सुझाव को सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से नकार दिया। पीठ ने सवाल किया कि सार्वजनिक भूमि पर हुए अवैध कब्जे के मामले में भला मध्यस्थता कैसी हो सकती है? इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने सेंट्रल बार एसोसिएशन की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
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