एमपी हाई कोर्ट ने माना भोजशाला मूल रूप से मंदिर, मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज

Sandesh Wahak Digital Desk: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने धार के विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर पर शुक्रवार को युगांतकारी निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि यह परिसर वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष के मस्जिद संबंधी दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया और वहां की व्यवस्थाओं के लिए अयोध्या मॉडल जैसी नीति का निर्णय सरकार के विवेक पर छोड़ दिया है।

हिंदुओं को मिला पूजा का पूर्ण अधिकार

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने वर्ष 2003 के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत हिंदुओं की पूजा को प्रतिबंधित किया गया था और मुस्लिमों को नमाज की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर कहा कि 1904 से ही यह क्षेत्र एक संरक्षित स्मारक है और इसकी मूल धार्मिक प्रकृति सरस्वती मंदिर की ही रही है। एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि वर्तमान ढांचे का निर्माण पुराने मंदिर के अवशेषों का पुन: उपयोग करके किया गया था।

एमपी हाई कोर्ट ने माना भोजशाला मूल रूप से मंदिर, मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज

वैज्ञानिक साक्ष्यों ने पलटा मामला

हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा सौंपे गए 2,000 से अधिक पन्नों के वैज्ञानिक दस्तावेजों पर आधारित है। सर्वेक्षण के दौरान मिले प्राचीन सिक्कों, मूर्तियों और शिलालेखों ने हिंदू पक्ष के दावों को मजबूती दी। हालांकि मुस्लिम पक्ष ने इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया था, जिसे एएसआई ने कोर्ट में सिरे से खारिज कर दिया। एएसआई ने दलील दी कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी थी और इसमें मुस्लिम विशेषज्ञ भी शामिल थे। अब इस फैसले के बाद दशकों से चला आ रहा कानूनी विवाद एक नए मोड़ पर पहुंच गया है।

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