‘बहुत देर कर दी हुज़ूर आते-आते’, सपा प्रवक्ता का मोदी सरकार पर तीखा प्रहार

Sandesh Wahak Digital Desk: भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता को लेकर चल रही बहस के बीच, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। यादव ने अपनी प्रतिक्रिया को शायरी, कहावतों और व्यंग्य के मिश्रण से कुछ इस अंदाज़ में पेश किया कि बयान चर्चा का विषय बन गया।

मनोज यादव ने प्रधानमंत्री मोदी के उस वक्तव्य पर सवाल खड़े किए हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत ने अमेरिका की मध्यस्थता का प्रस्ताव कभी स्वीकार नहीं किया और पाकिस्तान की गोली का जवाब भारत ने गोली से दिया है। यादव ने मोदी की देरी से आई प्रतिक्रिया पर कटाक्ष करते हुए कहा “बहुत देर कर दी हुज़ूर आते-आते…”।

13 बार ट्रंप बोले ‘सीज़फायर हमारी वजह से’

मनोज यादव ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 13 बार दुनिया के मंचों पर दावा कर चुके हैं कि उनके प्रयासों से ही भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम हुआ, लेकिन मोदी सरकार ने लंबे समय तक कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’।

ऑपरेशन सिंदूर’ और मजबूरियों पर हमला

मोदी सरकार द्वारा यह कहे जाने पर कि “हमने ट्रंप की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की, और ऑपरेशन सिंदूर जारी है”, यादव ने इस कथन को दिखावटी करार देते हुए तंज कसा कि अगर ऐसा था, तो प्रधानमंत्री को समय रहते ट्रंप को करारा जवाब देना चाहिए था, न कि चुप्पी साधनी चाहिए थी। यादव ने कटाक्ष भरे अंदाज़ में कहा “यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता, कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी।”

व्यापार पहले, राष्ट्र बाद में?

यादव ने मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की चुप्पी और ढुलमुल रुख इस ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं व्यापारिक हितों ने राष्ट्रीय हितों को दबा दिया। उन्होंने कहा आपके लिए ‘नेशन फर्स्ट’ नहीं, बल्कि ‘बिज़नेस फर्स्ट’ है और यह भी जोड़ा, आपके दोस्त ही इस देश को फिर से गुलामी की ओर धकेलने में लगे हुए हैं।

मनोज यादव का यह पूरा वक्तव्य न केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया थी, बल्कि उन्होंने इसे शब्दों की तलवार और व्यंग्य के तीरों के रूप में ढाला। उन्होंने कहा कि भारत के नागरिक अब सब कुछ देख और समझ रहे हैं देश के नाम पर राजनीति, या व्यापार के नाम पर राष्ट्रहित की अनदेखी।

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