फांसी की जगह जहरीला इंजेक्शन की मांग खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने बताया मौजूदा नियम
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड देने के लिए फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन जैसे कम पीड़ादायक तरीके अपनाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि फिलहाल देश में फांसी के जरिए मृत्युदंड देने की व्यवस्था लागू रहेगी। अदालत ने इस मुद्दे से जुड़े दीना बनाम भारत संघ के तीन पुराने फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी नहीं मानी।
क्या कहा गया था याचिका में
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर याचिका में CrPC की धारा 354(5) और अब BNSS की धारा 393(5) को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि फांसी क्रूर और अमानवीय है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक मौत का अधिकार भी माना जाना चाहिए।
याचिका में दावा किया गया था कि फांसी के बाद मौत होने में करीब 40 मिनट लग सकते हैं, जबकि जहरीले इंजेक्शन, गोली, इलेक्ट्रॉक्यूशन या गैस चैंबर जैसे तरीकों में कम समय लग सकता है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का भी हवाला दिया गया था।
भविष्य में विकल्प पर विचार संभव
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिका खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में वैज्ञानिक, मेडिकल या व्यावहारिक सबूत मिलने पर इस मुद्दे की संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती। केंद्र चाहे तो कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन और न्यूरोसाइंस विशेषज्ञों की समिति बनाकर विकल्पों की समीक्षा कर सकता है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पहले बताया था कि केंद्र इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहा है और समिति भी बनाई गई है। हालांकि, केंद्र ने कैदियों को फांसी या लीथल इंजेक्शन में से विकल्प देने को व्यावहारिक नहीं बताया था।

