पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन, लोक कला जगत में शोक की लहर
Sandesh Wahak Digital Desk: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाने वाली विख्यात पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे पिछले काफी समय से गंभीर रूप से बीमार थीं और शनिवार-रविवार की दरमियानी रात करीब 3:15 बजे उनका निधन हो गया। उनके जाने से न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के सांस्कृतिक जगत में एक अपूरणीय क्षति हुई है।
बचपन की प्रेरणा और तंबूरे का जादू
दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई को बचपन में अपने नाना से महाभारत की कहानियां सुनने का शौक था। यही शौक आगे चलकर उनका जुनून बन गया। सामाजिक बंदिशों को दरकिनार करते हुए उन्होंने महज 13 साल की उम्र में पहली बार मंच संभाला था। जब वे हाथ में तंबूरा लेकर कापालिक शैली में भीम का शौर्य या द्रौपदी का स्वाभिमान गाती थीं, तो उनका तंबूरा कभी गदा तो कभी धनुष बनकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था।
पद्मश्री से पद्म विभूषण तक का सफर
कला के प्रति उनके अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण के साथ-साथ पद्मश्री और पद्म भूषण से भी नवाजा था। तीजन बाई देश के लिए कितनी बड़ी धरोहर थीं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके स्वास्थ्य पर नजर रख रहे थे। पिछले साल नवंबर 2025 में पीएम मोदी ने खुद उनकी बहू को फोन कर तीजन बाई का हालचाल जाना था और हर संभव मदद का भरोसा दिया था। तीजन बाई का जाना भारतीय लोक कला के एक दैदीप्यमान नक्षत्र का अस्त होना है, लेकिन उनकी कड़क आवाज और अनूठी शैली पीढ़ियों तक कलाकारों का मार्गदर्शन करती रहेगी।
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